शुक्रवार, 22 मई 2009

लोभ -एक मिठा जहर

लोभ -एक मिठा जहर
काम क्रोध और लोभ इनका वर्णन श्री मद भगवद्गीता में किया गया है l भगवान कहते है ये जीव आत्मा को नरक में ले जाने के लिए ही है l कुछ एक लोग जो धन्य धान्य से सम्पन और जो स्वयं को ज्यादा आधुनिक कहते हैं, वे मानते हैं कि स्वर्ग और नरक नाम की कोई चीज इस दुनिया में है ही नही l
मैं अपनी तुच्छ और सिमित बुद्धि में आये अपने विचार इन शब्दों पर वैज्ञानिक आधार पर समझकर ही लिखने का प्रयत्न कर रहा हुं l
भगवान श्री कृष्ण ने गीता ज्ञान को विज्ञान भी कहा है l
तो ये तीन दोष किस तरह से हमारा पतन करते हैं l भगवान श्री कृष्ण, और भी वहुत से संत महात्माओं ने इन्हें जीव का शत्रु कहा है l कोई तो सच्चाई दिखाई दी होगी इनमें.. सिर्फ खाली बात ही बात तो नहीं की नही है उन्होंने l
सर्व प्रथम बात करते हैं काम की,, यहां काम का अर्थ सिर्फ वासना या सैक्स से नही है l काम मानें कामनाएं इच्छाऐं तृष्णा की बात करते हैं वासना भी काम ही है लेकिन वह काम का छोटा सा अंग है l
ये किस प्रकार से हमें नरक में कष्ट में ले जाते हैं l सर्वप्रथम तो स्वर्ग नरक को अपने अंदर सुक्षमतम में जानें
माना की कहीं कोई स्वर्ग या नरक नही है फिर भी ये कैसे हमारे शत्रु हैं l
काम का भाव उत्पन हुआ; कुछ पाने की लालसा कुछ बनने की इच्छा हुई तो जो अभी तक हम स्वयं में ही सुख शांत और संतुष्ट थे l वहीं अशांत बेचैन और व्याकुल हो गये, कोई भी जीव मनुष्य हो या पशु पक्षी दुखी और अशांत नही होना चाहता लेकिन काम के मुंह उठाते ही जो हमने सोचा है विचार किया है l मान लो गाङी लेनी है मकान लेना है उसी पर सारी एकाग्रता लग जाती है l यह इच्छा गलत नही है लेकिन इच्छा का अति में पहुंच जाना गलत है l हमारे पास इतनी योग्यता भी नही है, पैसा भी नही है, खुछ भी साधन नही है l जिससे हमारी इच्छा पुर्ण हो सके l लेकिन काम ने अपना प्रभाव हमारे शरीर के चालक पर दिखा दिया, और वह गाङी का संतुलन खो बैठता है l यह नही देखता की आगे रास्ता खराब है या लाल बत्ती है सब सिगनल तोङकर अपने अंदर की शांति को भष्म कर देता है l काम की अग्नि में स्वाहा कर देता है l यही तो नरक है जहां हम चैन से खा नही सकते, सो नही सकते बेचैन उदास और दुखी रहते हैं l
दुसरा है क्रोध ------
इन शत्रुओं से हमारा तो मानसिक शारीरीक आर्थिक हानि और अनिष्ट होता ही है, और अपने साथ साथ जो भी हमारे सम्पर्क में है हमारे निकट होते हैं उसे भी इस पीङा और दुख का शिकार होना पङता है l इसका कष्ट उठाना पङता है l तो हम बात कर रहे हैं क्रोध की - ये तीनों इस प्रकार हैं जैसे कई बल्ब सिरिज में लगा देते हैं l तीनों एक साथ जलते हैं इनका आपस में परस्पर घनिष्ट सम्बंध है l जब भी किसी विषय की कामना उत्पन होती है उसमें विघ्न या बाधा पङने पर जैसे वह पुर्ण नही होती तो क्रोध आता है l
क्रोध एक ऐसा भाव है जो नरक में ले जाने वाली गाङी का अंतिम स्थानक है l
यह अचानक से नही निकलता इसका अंकुर छोटी छोटी बातों से बाहर आता है l उस समय हमें इस बात का ज्ञान ही नही होता की क्रोध आ रहा है l पहले थोङी सी बेचैनी थोङा सा चिङचिङापन आता है l हम सोचते है कि तनाव है गोली का साहरा लेकर इससे बच जाते हैं l कोई हमारा थोङा सा अपमान कर दे हमारे मन के विरूद्ध हो जाये l जिस बात की हमने इच्छा की किसी कारण से वह पुर्ण नही हो पायी l जैसे हमने पत्नि को कहा चाय बना लो वो बेचारी शब्जी बनाने में व्यस्त है l नोकर को मालिक ने कुछ कहा चाहे किसी भी कारण से काम नही हुआ तो क्रोध अपना रंग दिखा देता है l ये छोटे छोटे ऱूप क्रोध के ही हैं l किसी भी विषय की कामना में बाधा पङना l और व्यक्ति का विचलित हो जाना चेहरा तमतमा जाना l
एक बात और हमारे सामने आती है l की 100 काम हमारे पुर्ण हो जायें लेकिन यह बेईमान मन अपनी पीठ थपथपायेगा l उस समय किसी को शाबाशी नही देगा l अगर 100 में से एक काम के पुर्ण होने में कोई रूकावट आ गयी l कोई बाधा पङ गयी l तो जिन लोगों ने 100 काम पुरे किये सभी में सफलता दिलवायी और पीठ ठोकी अपनी l तो आज क्या हुआ वो ही सब लोग हैं, वो ही दफ्तर है, क्यों खुद को नही कोसता l अब अपनी पराजय के क्रोध का शिकार मासुम लोगों को बना रहा है l इस क्रोध नाम के दुष्मन की एक और खास बात है l अपना शिकार अपने से कमजोर लोगों को ही बनाता है l
एक बेचारी पत्नि 7 वर्ष से जो भी पति ने कहा सब काम छोङकर उसे पहले किया लेकिन आज अचानक कोई छोटा सा काम को नही कर पायी तो पति ने मारे क्रोध के जुल्म और सिता की हद कर दी l
इस बात को समझनें में कुछ भी बाकि नही है की किस तरह हमें जीते जी क्रोध ने नरक में डाल दिया है l हर जगह दफ्तर में, घर में, दोस्तों में सब हमारे शत्रु बन गये हैं l घर में सीता रूपी पत्नि को इसकी ज्वाला में धधकना पङ रहा है l छोटी छोटी बातें हम सबको पता है लेकिन कभी बचने का प्रयत्न नही करते l
तिसरा है लोभ ------------------
काम क्रोध लोभ क्रम बद्ध तरिके से इसको सबसे अंत में स्थान दिया है l इसका इतना ज्यादा महत्व भी नही समझते l लेकिन अगर सजग होकर ध्यान दिया जाय सावधानी से देखा जाय, तो यह हमारे मन और शरीर को अंदर से खोखला कर रहा है l जैसे दीमक अंदर ही अंदर लकङी को अनवरत , लगातार खाती रहती है l और खोखला कर देती है लोभ भी ऐसा ही करता है l
काम और क्रोध तो मानव मन और तन पर कुछ ही समय अपना प्रभाव दिखाते हैं l लेकिन यह लोभ एक एक क्षण हमें हमारे प्रमानंद शांति, और चैन से हमें दुर ले जाता है l काम और क्रोध ऐसे हैं जिनके आगमन पर हमें तथा हमारे निकट वालों को आभास हो जाता है l की अब फलां शत्रु या चोर घुस गया है लेकिन लोभ इतने दबे कदमों से प्रवेश करता है की बाहर वाले तो क्या हम स्वयं भी नही जान पाते l
यह लोभ एक ऐसा जहर है की हमें अगर पता भी लग जाये, तो भी इसे थुकना नही चाहते, बाहर फैंकना नही चाहते l और जैसे दुध में पानी मिल जाता है किसी को भी दिखाई नही देता उसी तरह यह हमारे अंदर मिल जाता है l
व्यक्ति काम और क्रोध से बचने का उपाय भी सोचता है लेकिन लोभ को जैसे बच्चे शहद का निप्पल चुसते रहते हैं उसी प्रकार अंदर ही अंदर चुसता रहता है l
एक बात का स्पस्ट मैं कर देना चाहता हुं कि काम क्रोध और लोभ के बिना जीवन चलना भी असंभव है l अगर व्यक्ति की कामना ही नही होगी तो तो कार्य भी नही होगा l सृष्टि का उत्पन होना ही बंद हो जायेगा l पति पत्नि संतान की कामना करते हैं l फिर उनके लालन पालन की सोचकर उन्हें खुश रखने की इच्छा करती है l और अगर क्रोध नही होगा तो सारी कार्य व्यवस्था न्याय व्यवस्था अस्त व्यस्त हो जायेगी l व्यक्ति लोभ नही करेगा तो लाभ नही होगा, उन्नति नही होगी, इनके बिना शरीर और संसार का चलना भी असंभव है l
लेकिन जब तक ये दवा के रूप में शरीर में हैं तो ठीक हैं l जब दवाई उल्टा बिमारी बढाने लगे बङी हानि हो जायेगी l
जैसे एक पिता के कई बच्चे होते हैं l सब एक ही घर में रहते हैं l पिता सबके ऊपर निगरानी रखता है l उनका ध्यान रखता है l की कोई बच्चा गलत ना हो जाये संगती खराब ना हो जाये या फिर कोई शारीरीक बिमारी ना हो जाये l कहीं सारे भाई बहन आपस में ही झगङा ना कर बैठे l कितना ध्यान रखता है कितनी देखभाल करता है वह उन बच्चों का पिता l
इसी प्रकार उन बच्चों की तरह इनका संबंध हमारे मन से है l वह इन पर नियंत्रण करके अपनी सेवा भी करा सकता है l जैसे किसी परिवार का कोई बच्चा बिगङ जाता है असंतुलित या बेकाबु हो जाता है l तो परिणाम उस सारे घर के हर सदस्य के और जो भी निकट वाले हैं सबको को भुगतना पङता है l अगर काम क्रोध लोभ तीनों में से कोई एक भी असंतुलित हो गया,तो हमारा मन शरीर वाणी को इसकी सजा भुगतनी पङती है l
जिस तरह एक कुशल घर का संचालक अपने घर में तथा सदस्यों में स्वर्ग जैसा आनंद और प्रेम बनाता है l इस शरीर का संचालक मन के माध्यम से इनको नियंत्रण में रखकर अपने शरीर और मन की सुख शांति और जीव आत्मा को अधोगति में जाने से बचाकर परम धाम परम पवित्र परम शांत जगह ले जा सकते हैं l बस जरूरत है सजगता और सावधानी की l

जय श्री कृष्णा

शिवा तोमर

मंगलवार, 19 मई 2009

डर गये होली से

डर गये होली से
डर गये होली से सब सोच रहे होंगे की होली तो प्रेम बढाने का दिन है, मिलन का दिवस है l तो फिर डरेंगे क्यों ???
बात करीब 18-20 वर्ष पहले की है होली के सवा माह पहले से ही बच्चे लकङी काटकर होली की तैयारी करने लगते थे, औरतें फागुन की चांदनी रात में गीत गाकर अपनी खुशी का इजहार करती थी l
एक दिन सांय को करीब चार बजे मैं अपने पिताजी की अंगुली पकङकर खेत से आ रहा था मैंने देखा बहुत से लङके पेङों को काटकर सङक पर खिंचकर ला रहे थे l
मैंने पिताजी से पुछा--- ये सब क्या कर रहे हैं ???
पिताजी ने कहा-- बेटा होली आने वाली है l ये बच्चे होली को जलाने के लिए लकङी इकठठा कर रहे हैं l
मैंने भोलेपन से पुछा-- ये होली कोन है ?? और ये लोग उसे क्यो जलाते हैं ????
पिताजी ने मुझे बङे धैर्य से समझाया-- बेटा ये होली एक राक्षसी थी जो हजारों वर्ष पहले आग में जलकर मर गयी थी l वह बहुत बुरी थी l
मैंने कहा-- जब वह इतने वर्ष पहले वह मर गयी तो फिर अब भी उसे क्यों जलाते हैं ???
पिताजी ने कहा-- वह तो मर गयी लेकिन हम आज भी इस त्योहार के दिन लकङी की होली जलाकर जो हमारा आपस में लङाई झगङा, बैर, कलह होती है l इसे जलाकर आपस में गले मिलकर, प्रेम बढाते हैं, भाईचारा बढाते हैं l आपस में गुलाल लगाकर मिठाई खिलाते हैं l
मैंने होली आने तक बीच में कई बार पुछा कि कब है होली ??? जब हम सब गले मिलकर गुलाल लगायेंगे और मिठाई खिलायेंगे ????
पिताजी कहते की बेटा जल्दी ही है l
आखिर वह दिन आ ही गया l
चारो तरफ वातावरण में खुशियां ही खुशियां........
मानों सुर्य भी नाच रहा हो ........
और पवन इतनी लुभावनी चल रही है की मन में प्रेम बढा रही है......
हर एक के चेहरे पर हंसी मुस्कान ......
सब नये नये कपङे पहन रहे हैं l
मम्मी ने कहा मुझसे-- बेटा शिवा तु भी जल्दी अपने नये कपङे पहन ले होली पर जाना है l और अपने काम में लग गयी बङी व्यस्त सी लग रहीं थी l
उस दिन मम्मी ने दाल चावल बुरा घी बनाये थे l
गांव में कई जगह लोग इकठठा होकर होली के गाने गा गाकर आनंद ले रहे थे l
कितना मजा आया उस दिन मैं कागज पर पैन से नही लिख सकता l
वह तो अब बस मेरे ख्वाबों में ही रह गया है l
उन पलों को याद करके खुशी का अनुभव करके अभी भी आंखे भर आती हैं l
12 15 16 17 वर्ष की लङकीयां सज संवर कर गोबर के बहुत छोटे थोटे से उपले बनाकर रस्सी में पिरोकर अपने अपने घर से होली पर डालने जा रही थी कितनी सुन्दर लग रही थी
मैंने अपनी मां से पुछा-- मम्मी ये सब क्या है और कहां ले जा रही हैं
एक बात का मुझे गर्व है की हमारा सारा परिवार साधु संत प्रवृति का है l
नित्य सत्संग और गीता पाठ होता ही रहता था त
मम्मी ने कहा-- बेटा तु अभी बहुत छोटा है सब पता लग जायेगा उन्होने मुझे टालना चाहा
मैंने जिद्द से कहा की अभी बताओ मुझे l
मम्मी ने कहा-- बेटा ये सब होली को जलाने के लिए अपने अपने घर से डालने को जा रहे हैं
मैंने कहा-- इतनी लकङी तो पहले से ही इकठठा कर रखी हैं फिर इन्हे क्यो ले जा रही हैं ????
मम्मी ने बङे प्यार से कहा-- बेटा ये इस लिए की होली बहुत बुरी थी, लङाई झगङा करने वाली, सब लोग ये उपले इसलिए डालते हैं, की हमारे घर परिवार में जो अशांति है, लङाई झगङा है,
घृणा है l वह सब होली के साथ जल जाये और सब प्रेम से रहे l भाईचारा बढे, सब मिलकर रहे,
मैंने हां में सिर हिलाकर कहा-- अच्छा तो मम्मी जी मैं तो कई गिराकर आऊंगा l
मम्मी ने कहा-- क्यों बेटा कई क्यों ?????
मैंने कहा-- मम्मी जी आप और पिताजी झगङा करते हो l पिताजी, चाचा, ताऊ, सबका झगङा होता रहता है l मेरी चाची ओर चाचा लङते रहते हैं l मैंने भोले पन से कहा की मैं तो 10 गिराकर आऊंगा l सब में प्यार होगा फिर कोई नही लङेगा l
मम्मी जोर से हंसी -- बेटा शिवा तु अभी बहुत भोला है बालक है l
मैंने कहा क्यों मम्मी जी भोले और बालक नही डालते क्या ??????
उन्होने टालने के लिए कहा कि डाल आना जा अब अपने कपङे पहन ले l
मैंने सफेद छोटा सा कुर्ता पायजामा पहन लिया l
सारे गांव में खुशियां ही खुशियां l हर तरफ सब नये नये कपङे पहन कर घुम रहे थे l और उस दिन तो ऐसा लग रहा था जैसे सुर्य भी अपनी रोशनी को दुगना कर रहा हो l वह भी होली पर सबके साथ प्यार बांटना चाहता हो l
रात के करीब 8 बजे पिताजी मेरा हाथ पकङकर चले l
पिताजी मुझसे बोले-- बेटा शिवा मेरे पास ही खङे रहना कहीं इधर उधर नही चले जाना l
मैंने कहा-- नही पिताजी मैं आपके पास ही खङा रहुंगा कहीं नही जाऊंगा l
गांव के बाहर लकङीयों का बङा ऊंचा सा ढेर और उन पर बहुत से उपले भी पङे थे जो गोबर से बनाकर पिरो रखे थे वो भी सुखी टहनीयों पर लटक रही थी l
होली जलाने के लिए सैंकङो लोग इकठठा हुए थे l
ढोल नगाङे बज रहे थे लोग होली गा रहे थे l
9 बजे के करीब लकङी के ढेर योनि की होली में आग लगाई l
आग की लपटें बहुत ऊपर तक जा रही थी, मानों आसमान को छुना चाहती हों आंच इतनी तेज थी की सहन नही हो रही थी l
अचानक मैं चिल्लाया-- पिताजी भागो आग हमारी तरफ आ रही है और मैं भागने लगा l
सब लोग मुझे देखकर हंसने लगे l
एक बुढे ने कहा-- यह आग कहीं नही जायेगी बस यहीं तक ही रहेगी तु डर मत l
हम सब भी तो यहीं हैं l मैं सहमा सा डरा सा अपने पिताजी की गोद में सिमटा रहा l डरा डरा सा आग को देख रहा था जैसे पता नही कब वह हमारी तरफ भाग आये l
धीरे धीरे आग ठंडी हो गयी अब वहां मोटे मोटे से लकङों से धुंआ निकल रहा बाकि राख का ढेर l
होली जलाकर सब अपने अपने घर चले गये l
रात को पिताजी ने मुझसे कहा-- बेटा शिवा कल अपने पुराने कपङे पहन लेना जब खेलना और किसी से झगङा मत करना बस अपने घर में ही खेलना
छोटा चाचा आ गया मम्मी से बोले -- कल आप भाभी भांग की लस्सी बनाकर रख लेना l
पिताजी ने कहा-- जो भी होली खेलने आये सबको गुंजीयां और लस्सी दे देना l
------------------------ होली खेलने का दिन ----------------------------------------------
सुबह उठते ही मम्मी ने मुझे पुराने कपङे पहना दिये l
सारे बच्चे सुबह से ही रंगीन पानी की पिचकारी एक दुसरे पर फैंक कर खिलखिलाते, ताली बजाकर हंसते, होली का पुरा आनंद ले रहे थे l
बस हर तरफ मस्ती ही मस्ती खुशियां ही खुशियां मौसम झुम रहा था l
बङे बङे लोग ढोल नगाङे बजाकर खेलते खेलते सबके घरों में जाते l औरते उन पर पानी डालकर मारती l वो मस्ती में झुमते लस्सी पीते गुजीयां और मिठाई खाते फिर नाचने लगते l कितना आनंद आ रहा था l ना कोई छोटा बङा ना कोई हिंदू ना मुस्लिम ना जैन सब ऐसे रंगो में रंगे हुए की सब रंग फिके पङ जाये औरतो ने लोगो के कपङे फाङ दिये l
हम सब बच्चे भी उन पर रंगो की पिचकारी मार रहे थे l
सब लोग उस दिन मानो सब कुछ भुल गये बस होली ही होली खेलना, औरतों से पिटना, खाना पिना, और नाचना और मस्ती से झुमना बस और कुछ नही l
अचानक एक बच्चे की चिखने की आवाज आयी..... मम्मी..........................................
एक औरत ने भागकर उसे उठाया -- क्या हुआ लाला आंखे खोल लाला लाला
उसने रोते हुए कहा -- मम्मी अमित ने मेरी आंख में रंग फैंक दिया है l बहुत दर्द हो रहा है l
उस बच्चे का बाप ताऊ चाचा सब इकठठे हो गये l
कुछ ही क्षणों के बाद मस्ती भरे माहोल में जहर घुल गया l और मां बहन की गालीयां होने लगी l
दुसरी तरफ से कुछ लोग भी और जोर से बोलने लगे l
बातों बातों में ही लाठीयां बल्लम भाले निकाल लाये l
मैंने अपनी मां से कहा-- मम्मी आप तो कह रही थी होली जलाने से लङाई झगङा नही होता l
उन्होने मुझे डांटा तु चुप नही रह सकता हर समय चपङ चपङ करता रहता है l जुबान को बंद भी रख लिया कर l
और लङाई इतनी बढी की पांच सात आदमीयों के सिर फुट गये l
जहां थोङी ही देर पहले रंगो से भीगे हुए मस्ती में झुम रहे थे l वहीं खुन से लथपथ खाटों पर पङे गालीयां दे रहे हैं l
एक दुसरे के खुन के प्यासे l
मैंने चुपचाप अपनी पिचकारी घर के अंदर छिपाकर रख दी l
मैंने मम्मी से कहा--- मम्मी जी अब मैं कभी नही खेलुंगा होली मुझे पिचकारी से डर लगता है l
क्या गलती थी उस मासुम की ???? क्या गलती थी उस पिचकारी की ?????
उस दिन से मैं गांव में होली के मौके पर रहा ही नही और ना ही कहीं खेला l
ऐसा खेल क्या खेले जिसमें प्रेम की जगह नफरत हो हिंसा हो l नही करनी ऐसी मस्ती जिससे समाज में भाई चारे की जगह दरार पङे एक दुसरे के खुन के प्यासे हो l
जय श्री कृष्णा
शिवा तोमर