बुधवार, 8 जुलाई 2009

क्यों ?? बच्चा गर्भ में उल्टा होता है


यह बात सनातन काल से हमारे पुर्वज बताते आये हैं ! कि इस जीवन के लिए जन्म और मृत्यु सबसे बङे कष्ट हैं.. सबसे बङा नरक है !
गर्भ में बच्चा रक्त मांस के लोथङे में नीचे सिर ऊपर पैर करके पङा रहते है ! एक दो दिन नही पुरे नौ महिने ! हम तो नौ मिनट में ही दुखी हो जाते हैं बैचेन हो जाते है ! 8 -9 माह इसी तरह कष्ट उठाता हुआ पिङा सहता हुआ जब बाहर आता है तो सारा शरीर लहु से सना हुआ !
जब इस मायावी संसार में पहला सांस लेता है ! तो लहु लुहान इतनी बङी पीङा से मुक्त हुआ है, जैसे आदमी कई वर्षों पश्चात कारागार से मुक्त हुआ हो, लेकिन यहां आकर संतोष की सांस नही लेता चैन से नही बैठता ! मुक्ति की खुशी में हंसता नही बल्कि रोता है चिल्लाता है.. अगर बच्चा पैदा होते ही नही रोता तो दादा दादी मां बाप डाक्टर कहते हैं की बच्चा स्वस्थ नही है !
अरे भाई इतने कष्ट भोगकर आया है थोङा चैन लेने दो !
बच्चे की रोने की चिल्लाने की आवाज से घर में खुशी की लहर दोङ जाती है....
जो भगवान हमें दिखाते हैं अपनी माया से उसका आशय समझना चाहिए
लेकिन उसकी माया को समझना बङा दुस्तर है ! वो तो माया पति हैं हम माया के अधिन हैं !
कैसे हम माया के रहस्य को समझ सकते हैं ???
लेकिन प्रभु की कृपा से ही हमारे मन और बुद्धि में कुछ दिव्य भाव आते हैं ! जो मानव कल्याणार्थ होते हैं ...........
प्रमेश्वर अपनी माया समझाने के लिए किसी की वाणी को अपना यंत्र बनाते हैं , माध्यम बनाते हैं !
जो प्रकृति में वस्तु स्थिती दर्शायी गयी है, उसमें प्रमेश्वर तक जाने का दुखों से मुक्ति पाने का मार्ग है, लेकिन हम तो बस अपनी नजरों से अपने अनुसार ही उसके दर्शन करते हैं !
अगर एक बार प्रमात्मा की दिव्य दृष्टि से प्रकृति का दर्शन करे तो वही पर्मात्मा तक ले जाने वाली सिढी है...
गर्भ में बच्चा उल्टा ही क्यों होता है ????
संसार में आता है तो उल्टा ही आता है !
अगर 100 आदमीयों से अलग अलग पुछा जाय तो सबका उत्तर अपनी अपनी बुद्धि के अनुरूप अलग अलग ही होगा....
मैने भी विचार किया की हमारे पुर्वज संत महात्मा क्यों हमे बार बार इस बात का स्मरण कराते हैं की 9 माह ऊपर पैर नीचे सिर करके मल मुत्र में पङा रहता है ! और इतने कष्ट में रहने के बाद भी बाहर आकर सब भुल जाता है.....
क्यों ऐसी मुद्रा में रहता है ?????
यह तो मात्र संकेत है प्रमात्मा का, कि जिस तरह कष्ट में जिस नरक में मां के गर्भ में घुमता रहता है उल्टा पङा रहता है और उल्टा ही निकलता है !
इससे भी बहुत बङा गर्भ जिसमें पता नही कितने हजार करोङ वर्षों न जानें कितने जन्मों से यही इसी तरह घुम रहा है भटक रहा है ! भगवान ने संकेत भी किया है, हर मनुष्य को इसारा किया ! जन्म के साथ ही ज्ञान कराने का प्रयत्न करते हैं ... लेकिन यह मनुष्य बहार आते ही इस माया की हवा में उस ज्ञान के दिपक को बुझा देता है ! फिर इसे कुछ नही दिखाई पङता ....
इस संसार में आवागमन के कष्ट के कुएं से कभी सिधा नही निकल सकता सही और सहजता से उल्टा ही निकलेगा ! लेकिन गर्भ से बाहर आते ही सब भुल गया जो प्रमात्मा ने संकेत किया था, कि यहां से निकलने का एक मात्र मार्ग बस यही है..... हम क्या करते हैं ??? जो मार्ग हमें बताया था की यहां से बहार जा सकते हो वहां से निकलने के बजाय उल्टा उसी में प्रवेश करते चले गये ....
जैसे सरकार सङक मार्ग पर कहीं लाल बत्ती, कहीं प्रवेश वर्जित है के निर्देश बोर्ड लगा देते हैं ! यह सरकार का संकेत है ! अगर हम उसमें घुसे तो फंस जाते हैं ! आदमी के बनाये दिशा निर्देश नियमों का हम पालन करते हैं ! क्योंकि नियम तोङकर किसी विपत्ति में ना फंस जाये ! लेकिन जिस कष्ट को भोगते हुए कितने आंसु बह गये और न जाने कितने शरीर जलकर राख हो गये ! उससे बचने के लिए जो निर्देश दिये हैं जो नियम बताये हैं उनको नजर अंदाज करते रहते हैं !
और सारे सिगनल तोङकर फंस जाते हैं ! रास्ता है जन्म मृत्यु कष्टों से मुक्ति पाने का
इसका मतलब यह नही है कि हम उल्टे ही खङे हो जाओ ! नही अर्थात जहां से हम उल्टे होकर अबोध सम और निर्दोश होकर आये हैं वैसे ही जाने का इंतजाम करो !
पहले स्वयं गर्भ में रहा बाहर आते ही सब कुछ भुल कर और लग गया पढाई लिखाई धन व्यापार बीबी बच्चों में ! वह क्षण याद नही जो मल मुत्र में सिर रखकर पङा था ! जिस मायावी संसार से इतना स्नेह कर रहा है मोह कर रहा है ! इसमें प्रवेश करते ही पहला सांस लिया तो रोना प्रारम्भ हो गया था ! आज इसी को सम्पुर्ण सुख सास्वत आन्नद मानकर रात दिन कोल्हु के बैल की भांति पिलता रहता है !
प्रमेश्वर कितने दयालु हैं पग पग पर संकेत देते हैं ! अब उसके घर परिवार में बच्चे पैदा हो गये उन्हे देखकर भी अपना अतीत याद नही आया ! और उनकी तोतली आवाज को सुनकर कितना आन्नदित और भाव विभोर होता है ! याद ही नही रहता की कोई शक्ति है जो तुझे पुकार रही है ....
एक और संकेत प्रभु का बच्चा जब किसी को देखता है कभी उदास होता है कभी हंसने लगता है ! हम सब इस संकेत को भी अपनी बुद्धि से समझकर बालक का चुलबुलापन शरारती देखकर कितना आन्नदित होते हैं !.
अरे भाई समझ जाओ इतने मुर्ख मत बनो जो बाद में माफी के लायक भी ना रहो ! बच्चा कभी उदास होता है कभी खुश तो कभी गम्भीर हो जाता है ! उस क्षण बच्चे को अपने सैंकङो जन्म याद होते हैं और जो सामने होता है उसे भी पहचानता है जो किसी जन्म में दुश्मन रहे या जो अपने रहे उन्हे देखकर वैसी ही मुद्रा बनाता है ! और हम उसे देखकर बाल क्रिङा समझकर खुश होते रहते हैं...
वही गर्भ वाला बच्चा यह सब देखता हुआ परिवार बीबी बच्चे आदि को सुख दुखों को भोगते भोगते कब अंत समय आ गया मुंह में दांत नही पैरों में चलने की ताकत नही फिर भी बिस्तर पङा पङा भगवान से प्रार्थना करता है हे प्रभु बस छोटे बेचे के बच्चे का मुंह और देख लुं !
अरे पागल मानव नही सम्भल रहा !!!
जब बालक का जन्म होता तो ना मुंह में दांत होते हैं ना पैरों में चलने की ताकत होती है ! वही क्षण आ गया जैसे आया था क्यों व्यर्थ में प्रार्थना कर रहा है ?????
कितने गति अवरोधक लगाये जीवन की सङक पर लेकिन क्या करें ??? कुछ देखा ही नही ! आदमी मरता है खुली हथेली होती है ! उन्हे देखकर कहते हैं देखो भाई सब यहीं छोङकर चला गया, हम भी ऐसे ही चले जायेंगे ! कुछ क्षण उपरान्त सब भुल जाता है ! और लग जाता है माया को फेर में ! और बच्चों की तोतली आवाज में !
यही संकेत है उल्टा पैदा होने का कि जब तक मानव अपने आप को इस माया और मोह से नही मोङेगा तो इसी तरह दंड भोगता रहेगा ! अपनी मंजील से दुर होता जाता है!
कुछ नही समझा साधु संतो महात्माओं शास्त्र सारा जीवन सुनता तो सबकी रहा ! देखता हर बोर्ड पर कि क्या लिखा है ??? की फलां जगह जाना वर्जित है ! मगर जीवन की भागम भाग में सब सिगनल तोङता जाता है !
अंत समय में सांस इस शरीर से निकलना चाहता है ! लेकिन बङा कष्ट हो रहा है... जब जीव निकलता है तो आगे जो शरीर मिलने वाला होता है वही दिखाई देता है ! पुरा जीवन अपराध करता रहा, आखिर पकङा गया ! जेल तो जाना पङेगा ना भाई ....
जिस मंहगी बहुमुल्य कार में सारा जीवन सफर करता रहा उसे छोङकर घटीया सी गाङी में तो बैठने तो कतरायेगा ना अब ! हम सब भी कतराते है !
यह मानव तन छिना जा रहा है ! कुकर सुकर गधा किट का तन मिल रहा है ! यह जीव मानव तन को छोङना नही चाहता बङी पीङा हो रही है एक एक सांस लेना भारी हो रहा है ! घर वाले भगवान से दुआ करते हैं कि हे भगवान इन्हे उठा लो हम पंडित बैठायेगें चद्दर चढायेगें !
जब यह बात उसके कानों में पङती है बङा कष्ट होता है ! अब उसे सारी बातें याद आती है कि किस तरह जिनकी खातिर सारे सिगनल तोङे वो ही आज मेरे मरने की प्रार्थना कर रहे हैं ....
भाईयों यह बात किसी एक की नही है हम सबके साथ घटती है !
तो जीवन में प्रमेश्वर के संकेत दिशा निर्देश देखकर ही चले की प्रभु हमें इस क्षण क्या संकेत दे रहे हैं ???? अगर हमें मंजील तक पहुंचना है तो सावधानी से यात्रा करनी होगी जो पैदा होते समय साथ लाते हैं अर्थात लहुलुहान होकर आते हैं विचार करें इस जगत में पहला सांस लिया लहुलुहान खुन ही खुन था हमारे ऊपर इससे हमें बचना है की कहीं हमसे खुन ना बहे इसमें हम शामिल ना हों... सावधानी बरतनी है
बाकि सब समझदार हैं!

जय श्री कृष्णा शिवा तोमर 09210650915

सोमवार, 6 जुलाई 2009

रहस्य कृष्ण जन्म का


रहस्य कृष्ण जन्म का
भगवान श्री कृष्ण का नाम तो सभी ने सुना है, और कृष्ण जन्म को तो आज भी लोग 5000 वर्ष से भी ज्यादा समय बीतने के बाद भी हर वर्ष बङी धुमधाम से जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं ! लोग मंदिरों में छोटे छोटे बच्चो को राधा कृष्ण के जैसी पोशाक पहनाकर सजा धजा कर बैठाते हैं !
आज तक जितने भी भगवान ने जितने भी अवतार लिए हैं कृष्ण अवतार सबसे पुर्ण मानते हैं !. भगवान के हर अवतार उनका हर कर्म उनकी हर लीलाओं में बहुत गहरा रहस्य छिपा होता है ! जिन पर भगवान की असीम कृपा होती है उसी बुद्धि में दिव्य झलक आती है !.
में बात कर रहा हुं श्री कृष्ण जन्म की ! उनके हर कर्म में अपने भक्तो की मुक्ति का रहस्य छिपा रहता है !
गीता में भगवान ने एक जगह कहा है, कोई भी श्रद्धा रहित और अंहकारी मुझे नही जान सकता वह तो भगवान को आम आदमी की तरह जन्मने वाला और मरने वाला समझता है !
में भगवान से प्रार्थना करता हुं कि हे प्रभु मुझे अपनी असीम कृपा प्रदान करो, जो कि मैं आपके जन्म के रहस्य को आपके भक्तों में कहकर उन्हे उस पथ पर ले चलुं जहां आपका धाम है.......
भगवान ने कृष्ण अवतार में आकर जितनी भी लीलाऐं की है ! वह संसार के हर व्यक्ति के लिए संदेश था ! उनके साकार रूप को सारी दुनिया पुजती है ! लेकिन उनका स्वरूप केवल पुजा तक ही सीमित नही है !
भगवान का अवतार होने ही वाला है ! चारो तरफ हर दिशा में खुशियों की लहर सी चल पङी ! स्त्री पुरूष देवी देवता किन्नर यक्ष सब खुशियों के गीत गा रहे हैं..........
भगवान को तो धरती का भार उतारने के लिए आना ही था ! तो उन्होने मानव कल्याणार्थ हमें समझाने के लिए संकेत दिखाया है ! कि किस तरह हम अपने दुखों की जंजीरो से मुक्त हो कैसे हमें सुख चैन प्राप्त हो............
गीता में ही भगवान ने कहा है की अज्ञानी और आसुरी स्वभाव वाले तो इस आत्मा को श्रवण करके अध्ययन करके भी नही जान पाते ! जिन पर भगवान की कृपा होती है वो ही उनके रहस्य भरे संदेश को उनके संकेत को समझनें में सफल हो सकता है.........
भगवान श्री कृष्ण को जिसने जिस भाव से भी भजा है पुजा है उन्होने उसी रूप में दर्शन दिये ! लेकिन उनकी यह कृष्ण जन्म की लीला हमारे लिए क्या संदेश थी !
भगवान ने ना जाने कितने अवतार धारण किये हैं ! लेकिन कृष्ण अवतार में उनके गर्भ से पहले ही मां बाप को कैद में डाल दिया था कारागार में डाल दिया था ! कारागार एक ऐसी जगह है अगर हम जरा सा भी चिंतन करें तो एक बात स्पस्ट होती है हम संसार की भीङ में रहते हुए भी कितने अकेले हैं !
लेकिन इस बात का चिंतन करने का तो समय तो हमारे पास है ही नही ! जैसे सङक पर स्पिड ब्रेकर होते हैं ताकि गाङी की गति तेज ना हो और हमारे नियंत्रण में रहे कोई दुर्घटना ना घटे...
भगवान का संकेत स्पस्ट होता है लेकिन हमारी बुद्धि रजोगुण या तमोगुण से घिरी होने के कारण कुछ नही देख पाती ! और सारे सिगनल तोङकर बंधनों में फंस जाती है... अगर कोई जेल जाता है तो चाहे उसके पास कितनी भी धन दौलत हो उसके मां बाप, भाई बहन, पति पत्नि यार दोस्त बंगला गाङी धन दौलत कुछ भी उसके काम का नही रहता ! बस 2बाई 6 की जगह सोने के लिए उसकी होती है...
हमारा भी इस जहां में कुछ भी नही है ! कितनी भी मारा मारी कर ले भागा दोङी कर कितनी भी धन दौलत का संग्रह कर ले लेकिन अंत में वही 2 बाई 6 की ही जगह मिलेगी!
सर्व प्रथम बात करते है कि भगवान का जन्म जेल में दिखाया है और भगवान के मां बाप जो की कभी राजकुमार और राजकुमारी थे वो भी जेल में हैं बन्धनों में है ! कितनी यातनाएं भोगनी पङी.....
क्या कोई दिवार है ???? या कही इतनी मजबुत सलाखें हैं ????? जो भगवान के मां बाप को कैद कर सके ! अरे भाईयों जो मुक्ति के धाम हैं ! जिनके स्मरण मात्र से भव बन्धन से मुक्ति मिल जाती है ! मुक्ति जिनकी दासी है ! क्या वो कैद हो सकते हैं ???
वो तो भक्त वत्सल हैं ! अपने भक्तों का अपने सेवकों का उद्धार करने के लिए जो सुकर का रूप धारण कर सकते है ! तो कारागार क्या बङी बात है..........
कितना स्पस्ट है, कि हम चाहे कितने भी अमिर घर में जन्म ले चाहे कितनी भी धन दौलत हमारे पास है ! कानुन तोङते ही हमें बन्धन में आना पङता है कारागार में यातनाएं भोगनी पङती हैं ! हर जीव कारागार में है ! जंजीरों में जकङा पङा रहता है ! पिंजङा चाहे सोने का हो या लोहे का यो फिर लकङी का पिंजङा तो पिंजङा ही होता है ! अर्थात चाहे हमें मानव रूपी पिंजङा प्राप्त हुआ हो या कोई और .......
इन भोगों को भोगने के लिए हमें यह कारागार मिलती है ! अगर हमें यह तन प्राप्त हुआ है तो जेल यानि बंधन तो भोगने ही पङेंगे ! यही कारण था कि गर्भ में प्रवेश करते ही जंजीरों ने हमें जकङ लिया है बन्दी बना लिया हम गुलाम हो गये अपने भोगों की कैद में है .........
फिर दिखाया है भगवान पैदा हुए तो वसुदेव और मां देवकी के मन में उन्हे बचाने की योजना बनने लगी ! योजना तो हम सब भी बनाते हैं कि किस तरह से अपनी जीव आत्मा को भव सागर के आवागमन से मुक्ति दिलायें ??? कैसे इसको कैद से मुक्त करे???? लेकिन हम अपनी कोशिश और प्रयास में सफल नही हो पाते....
तो माता पिता के दिमाग में उन्हें बचाने की बात आयी, लेकिन बचाये तो बचाये कैसे ???? ना कोई साधन है ना रास्ता ! दोनो की आंखे मिलती है और दोनो का एक ही मुक सवाल की कैसे बचाये कहां ले जाये क्या करें ?????????
यही हालत हम सबकी है हम सब तो निराश हो जाते हैं !
काली अंधेरी रात मुसलाधार बारिस ……
काली रात अज्ञान का प्रतिक है ! इस अज्ञान के कारण ही हम अपनी यात्रा में आगे नही बढ पाते और निराश होकर अपने पथ से भटक जाते हैं ..............
इतनी भयंकर रात बादलों की गङगङाहट बिजली का जोर जोर से चमकना ऐसी विकट परिस्थिती ...........
देवकी मां विनती करती है, कि बचा लो मेरे लाल को मैं इसके बिना नही जी सकती ! कितना सुन्दर और स्पस्ट संदेश है !
देवकी रूपी बुद्धि तो सदा ही चाहती है की आत्मा को मुक्ति मिले परमशांति को प्राप्त हो लेकिन काली अंधेरी अज्ञान की रात में भटक जाते हैं ! माता देवकी के बार बार विनती करने पर वासुदेव जी सहमत हुए तो जब मन और बुद्धि एक होते होते हैं जंजीरे स्वत: ही टुट जाती हैं ! अज्ञान भय शंका संदेह ये सब मन मे ही होता है !.....
वसुदेव जी कहते हैं कि देवकी इच्छा तो मेरी भी है की अपने बेटे को बचाऊं ! लेकिन कैसे जाऊंगा बाहर लेकर ????
इतने विचार मात्र से हथकङी खुल गयी ! कितना स्पस्ट समझा रहे हैं लेकिन हम तो.....
जेल से मुक्ति कोन नही चाहता ?? लेकिन जिन बेङियों ने हमें जकङ रखा है तृष्णा का जंजीर, कभी न पुर्ण होने वाली आशाओं की फांस में फंसे रहते हैं और अज्ञान की अंधेरी रात में निकलने का साहस ही नही करते हिम्मत ही नही जुटा पाते.....
देवकी मां और वसुदेव जी की एक राय हुई तो स्वत: ही सभी जंजीरों से मुक्ति मिल गयी ! अपने पथ पर चलने के लिए यह प्रथम सफलता है...
वसुदेव जी कहते हैं- इतनी बारीस हो रही है काली अंधेरी रात ना हमारे पास कोई कपङा है ! ना कोई दुसरी ऐसी चीज है, जिसमें अपने इस नन्हे से बच्चे को ले जाऊं...
तो देवकी कहती है- यह सूप रखा है इसमें ले जा !.
हम कृष्ण जन्म को बस फिल्मों में पर्दे पर देखकर किताबों में पढकर ही भाव विभोर होते रहते हैं ! कि कितने कष्ट में कितनी विपत्तियां उठाकर मां बाप ने कृष्ण को बचाया था ! और भाईयों समझने का प्रयत्न करो भगवान अवतार लेकर धरती से पाप कर्म अधर्म को मिटाने के लिए आ रहे हैं ! तथा अपने भक्तों की तरफ संकेत भी कर रहे हैं !
देवकी मां ने सूप दे दिया ..... अरे भाईयों क्या है ये सूप ???? जब बुद्धि मन के साथ होगी ! यानि की ये चंचल मन जो की कभी भी नही ठहरता रूकने का नाम नही लेता.... जब भी बुद्धि के पास आकर साहयता चाहता है ! मदद की भीख मांगता है ! तो बुद्धि के पास कुछ भी नही है बस एक सूप है वही दे देती है वसुदेव जी को....
सुप नाम सुनकर ही आभास हो गया होगा की सूप का क्या काम है.. सूप कबाङ को गेहुं आदि में से छिटककर बाहर कर सफाई करने का काम करता है ...
यह सूप विवेक है.... जब विवेक आता है तो हमारे अंदर की गंदगी को निकलना ही पङता है .. जब हम अपने विवेक के साहरे आगे बढते हैं तो मार्ग में आने वाली हर समस्या तमाम अङचन हर बाधा दुर हो जाती है !
जंजीरें खुल गयी ! जैसे ही सूप में भगवान को लेकर चले !
एक खास बात और है, ध्यान रखने की जैसे वसुदेव जी भगवान को लेकर चले बिलकुल वस्त्र हीन ऐसा नही था की देवकी के पास एक भी कपङा नही हो !
लेकिन भगवान ने गीता में स्पस्ट कहा है कि अगर मैं कर्मों सावधानी ना बरतुं तो बङी हानि हो जाय ! तो यहां भी उन्होने बङी सावधानी बरती है !
जिस तरह वसुदेव जी कृष्ण को बिना किसी कपङे में लपेटे हुए सूप में लेकर चले ! बिलकुल उसी तरह हम भी अपनी मुक्ति के मार्ग पर चल सकते हैं !
जब तक हम कहीं लिप्त रहेंगें, किसी में लिपटें होगें तो चल ही नही सकते !
वसुदेव जी कृष्ण को सूप में लिटाकर चलते हैं, पिछे देवकी बङी व्याकुल नजरों से निहार रही है अपने लाल को ! आंखों से ममता छिलककर बाहर आ गयी !
क्या हैं वो आंसु ! गहन चिंतन की आवस्यकता है !
हमारे अंदर जब तक कटटरता होगी ! कठोरता होगी तो आगे नही बढ पायेंगें !
कटटरता टुटकर कठोरता पिंघलकर आंसु बनकर बाहर आये और अंदर कोमलता भावुकता की प्रबलता रहे तो हमें अपनी यात्रा करने में साहयक होगी !
आगे जरा ध्यान देना कितने अचम्भे की बात है ! की वसुदेव जी कन्हैया को लेकर चले ! कारागार के सारे पहरेदार, जो बङी सजगता से पहरेदारी कर रहे थे ! वो सब खङे खङे ही सो गये ! हथियार भी उनके पास है, लेकिन सो गये ! ताले भी खुद ब खुद खुल गये !
जब हम प्रमात्मा को लक्ष्य बनाकर अपने विवेक के साहरे आगे की यात्रा तय करते हैं ! तो हमारे अंदर की कारागार के सारे पहरेदार जो हमारे रास्ते में बाधक हैं ! काम क्रोध लोभ मोह भय वासना और तृष्णा वो सब सो जाते हैं !अगर हम सोचे की हमारे सभी विकार प्रमात्मा के रास्ते चलते ही समाप्त हो जायेंगे ! जी नही ये रहेंगे तो हमारे अंदर ही लेकिन हमारा किसी प्रकार का अनिष्ट नही करेंगे ! हमारी यात्रा में किसी भी तरह से बाधक नही बनेंगे कोई रोङा नही अङायेंगे ! सब तो जायेंगे !
कितना सुन्दर दृष्य है ! काली अंधेरी रात मुसलाधार बारिस, और वसुदेव जी कृष्ण को सूप में लिटाकर सिर पर रखकर चले हैं ! ऐसी घनघोर बारिस डरावनी रात भयभीत तो वसुदेव जी भी थे ! लेकिन जरा सा ध्यान दे कि नये जन्में बच्चे को क्या कोई पिता इस तरह से सिर पर रखकर ले जाते हुए देखा है ! कितनी अदभुत और खास बात दिखाई है ! ... अरे भाईयों हर मां बाप अपने बच्चे को धुंप छांव आदि से बचाने के लिए सीने से लगाता है सिर पर रखकर कोई नही ले जाता !
यहां पर भी प्रभु ने ऐसी बात का संकेत किया है जिसके बिना हम कारागार से मुक्त नही हो सकते ! इस बात पर अम्ल किये बिना बंधनों से आजाद नही हो सकते !
भगवान ने सारी बाते बतायी भी हैं कहा है कि !
शरीर इंद्रियां मन और बुद्धि से ऊपर और श्रेष्ठ है आत्मा ,,, आत्मा को श्रेष्ठ जानकर क्रम करो तो मुक्त हो जाओगे...
यह बात साकार करके भी दिखा दी .... वसुदेव जी कितने भयभीत थे ! जिस प्रकार उन्होने सबसे ऊपर भगवान को लेकर यात्रा प्रारम्भ की ! हमें भी अपनी यात्रा इसी तरह से करनी पङेगी ! लेकिन हमने तो अपने ऊपर सारी दुनिया को रखा हुआ है ! भगवान के लिए तो वहां जगह ही नही है ! कभी मां बाप को सिर पर रखकर चले, तो कभी बीबी बच्चों को रख लिया, तो कभी काम धंधे को रख कर चल पङे, तो कभी क्रोध को रख लिया तो, कहीं भय के साथ चल पङे !
अपने सिर को यानि की दिमाग को कभी खाली छोङी ही नहीं जिससे हम प्रभु को साथ लेकर चल सके ......
उसके आगे बढते हैं क्या देखते हैं कि वासुदेव जी कृष्ण को लेकर मुसलाधार बारीस में आगे बढ रहे हैं, तो शेषनाग जी उनके ऊपर फन फैलाये खङे हैं ! नाग को मानते हैं काल का रूप ! तो जब हम संसारी वस्तु को अपने सिर पर रखकर चलते हैं तो वही काल हमें डसता है भयभीत करता है..........
लेकिन वासुदेव जी की तो रक्षा कर रहा है मुसलाधार रूपी हर विपत्तियां जो हमारे मुक्ति के मार्ग में हैं तो वो ही रक्षा करेंगें !
सारी अङचनों और बाधाओं से निकलते हुए बढ रहे है ! अभी तो बहुत बङी नदी भी पार करनी है ! यह भवसागर पार करना है जो हर क्षण हमें डुबोने के लिए मुंह बाये खङा रहता है .....
हथकङी बेङी कारागार मुसलाधार बारीस नदी का तुफानी वेग काली अंधेरी रात इन सबके पार करते हुए वसुदेव जी नंद बाबा के घर पहुंच जाते हैं...
वहां मैया यसोदा को सोई हुई दिखाते हैं और एक कन्या को उन्होने भी जन्म दिया है लेकिन यसोदा जी को कोई खबर नही है .....
वासुदेव जी धीरे से कृष्ण को उनके पास लिटाकर और कन्या को उठाकर अपने सीने से लगाकर वापिस चल पङते हैं ! कन्या को देवकी की गोद में देते ही वह जोर जोर से रोने लगी और सब पहरेदार जग गये हथकङी बेङी लग गयी ......
बङे समझने की बात है इस कन्या रूपी माया के आते ही फिर हमारी बुद्धि में पर्दा पङ गया और हम कैद हो गये ..........
अगर कोई गलती हो तो माफ करना
जय श्री कृष्णा
शिवा तोमर