शनिवार, 12 सितंबर 2009

बङे शर्म की बात है- क्या होगा इन लङकियों का



सोनिया गांधी जी शीला दिक्षित जी जबाब दो
कल की एक खबर पढकर दिल भर आया की कैसे हालात हो गये हैं देश के। हमारा युवा वर्ग किस तरह से अपराध और सैक्स के चंगुल में फंसकर अपना भविष्य चौपट कर रहा है। खजुरी खास के एक स्कुल में परिक्षा के दौरान जो कुछ भी हुआ उस हादसे से आज सारा देश तो शर्मशार है ही लेकिन, एक बात और है कि मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम के देश की ही आज मर्यादा खतरे में है। हमारे बच्चे आज अश्लीलता के चंगुल में इस तरह फंस गये हैं कि खुले आम लङकियों के कपङे फाङकर अपनी हवश पुरी कर रहे हैं। अभी सरकार ने महिलाओं को 50 फिसदी आरक्षण दिया है। जो 5-7 लङकियां उस हादसे कि शिकार हुई हैं क्या कोई आरक्षण उस क्षति को पुरा कर सकता है। और जो दर्जनों मासुम बच्चीयां उस विभत्सय दृष्य की साक्षी हैं जो अभी सदमें से लङ रही है उनका क्या होगा। जिसने भी वह दृष्य अपनी आंखो से देखा अभी भी याद करके उनके शरीर के रोंगटे खङे हो जाते हैं। जो लङकियां ऊपर सिढियों से गिरती हुई निचे आयी क्या उनमें हिम्मत होगी कि वो पढने के लिए स्कुल जाने का नाम ले। सारे देश में महिला दिवस.महिला कल्याण और बहुत से नामों से पैसा और समय बरबाद किया जा रहा है।
स्कुल कालेजों में योन शिक्षा के माध्यम से भी जागरूक करने का काम किया जा रहा है। लेकिन परिणाम हम सबके समक्ष है। और ऐसा सिर्फ एक स्कुल में ही नही हो रहा सारे देश में ही देख लो जितना भी अपराध, हिंसा, अश्लीलता और व्याभीचार बढ रहा है उस सबमें 80 प्रतिशत कालेज और स्कुल के विधार्थी ही हैं।
समझ नही आ रहा कि किसके हाथ की कठपुतली बन गये हैं लोग... कहां से इतना दिमाग आ रहा है। अश्लीलता को और ज्यादा बढाने का काम समलैंगिकता को स्वीकृति देकर किया जा रहा है।
एक दिन मैं अपनी ड्युटी करके घर जा रहा था तो स्कुल की भी छुट्टी हो गयी। तो बच्चे आपस में बात कर रहे थे मैंने ध्यान से सुना तो उनमें से एक कह रहा था कि अब सरकार और कोर्ट ने थी इजाजत दे दी है होमोसैक्स को। मैंने उससे पुछा कि भाई क्या होता है यह। उसने बङे लापरवाह अंदाज में कहा कि अंकल ज्यादा तो पता नही लेकिन अब लङकियों कि जरूरत नही रहेंगी।
अब आप ही चिंतन करो कि कैसा परिणाम रहेगा योन शिक्षा और समलैगिकता जैसी बातों का हमारे बच्चों पर।
एक दिन मैंने एक अखबार में पढा था कि एक 12 वर्ष का लङका बाप बन गया और लङकी है 14 साल की। ये खबर किसी पश्चिमी देश की थी। देखो तो सही कि दुनिया कितनी तरक्की कर रही है।
सरकार कहती है कि दोषियों को खिलाफ कार्रवाही होगी। सुनते सुनते कान ही पकने लगे हैं। लेकिन क्या करें।
अब खजुरी खास के उस मनहुस स्कुल को खुनी स्कुल कहा जा रहा है। कह रहे हैं कि खुनी स्कुल में नही पढेगी लङकियां। लोगों का गुस्सा थमने का नाम नही ले रहा वहां पर भारी पुलिस लगा दी गयी। इससे ज्यादा कर सकती है सरकार।
जब तक मरीज कि बिमारी का डाक्टर को पता नही चलेगा कि मेरे मरीज को क्या बिमारी तो कैसे ईलाज होगा। यह कितने लानत की बात है कि लोग कह रहे हैं कि हमारी बच्चीयां इस स्कुल में नही पढेंगी। सरकार की बेबशी इससे ज्यादा और क्या देखने को मिलेगी। जनता तो ऐसी है जो सामने है बस वही देखती है। आज एक स्कुल से अपनी बच्चीयों को हटा लेंगे कल ऐसी घटना किसी और स्कुल में हो जायेगी। तो आखिर कहां मां बाप अपनी बेटीयों को सुरक्षित समझे। कितनी भी पुलिस बढा दी जायें थाने बना दिये जाये। यह तो बस ऐसी ही हमारी कोशिश है जैसे कोई महामारी फैल जाये और हर अस्पताल में दुनिया भर के डाक्टर बैठा दे और बिमारी की कोई दवा उनको ना दे तो कैसे होगी बिमारी से मुक्ति ?????????????????
बापु गांधी के सिद्धांतो को सारी दुनिया स्वीकार कर रही है। उनके जन्म दिवस को विस्व अहिंसा दिवस के रूप में भी मनाया जाने लगा। लेकिन हमारे ही देश में कोई भी उनके बताये सिद्धांतो को ना तो ग्रहण ही कर रहे हैं और ना ही कोई उन पर चल रहा है। आज के विधार्थीयों की तरह से गांधी जी भी ईंगलैंड पढकर आये थे। लेकिन उनके जीवन में ऐसा क्या कुछ था जिससे आज सारी दुनिया उनके कर्म, आचरण और व्यवहार को महान मानने पर मजबुर हैं।
जिस आयु के बच्चे आज लङकियों के कपङे फाङ रहे हैं उसी उम्र में उधमसिंह ने कितना महान संकल्प किया था।
विचार करने वाली बात यह है कि दिल्ली ही नही पुरे देश में ही देख लो हर व्यक्ति भय में जी रहा है। डरा हुआ है सहमा हुआ है। कि पता नही किस समय कोनसी घटना का शिकार बन जाये। बङे नेता बङे अधिकारी सब लोग बयान बाजी में पिछे नही रहते एक दुसरे पर वार करते रहते हैं। किसी को किसी से कोई मतलब नही कहीं कोई भावना नही। बस स्वार्थ ही समाया है चहुं और।
इस घटना को देखकर मुझे एक और घटना की याद आयी है जिसे आप हम सबने सुना है। जैसे इस स्कुल में लङकियों को वस्त्रहीन किया गया 5600 वर्ष पहले भी भरी सभा में एक महिला को वस्त्रहीन करने का प्रयास किया था तो परिणाम भी हम सबने सुना होगा।
ऐसी ऐसी घटनाओं से हर कोई चिंतित है परेशान है लेकिन क्या करे किससे कहे अपने दुखङे। क्योंकि कोई इस लायक नही है जो आज हमारे बच्चों के गिरते चरित्र को संवार सके। जो आयु खेलने और पढाई की है उसमें ही वो सैक्स और नशे के आदि होकर समाज की सुख शांति भंग कर रहे हैं।
शिक्षा के साथ साथ जरूरी है बच्चों को संस्कारी और चरित्रवान बनाना। लेकिन जो बात मैंने इतनी आसानी और सहजता से लिख दी है इस पर अम्ल करना और आचरण में लाना लोहे के चने चबाना है।
क्योंकि कोन देगा चरित्र निर्माण की शिक्षा।
जिसका स्वयं का ही चरित्र अच्छा नही है जो खुद ही भ्रष्टता में लिप्त हो वो दुसरो को कैसे पवित्र कर सकता है।
भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि श्रेष्ठ पुरूष जैसा जैसा आचरण करते हैं अन्य पुरूष भी वैसा ही करते है। तो इस बात का भी विचार करो जो हमारे समाज को चलाने वाले वो कैसे हैं उनका चरित्र कैसा है। जैसे शिक्षक हैं, नेता हैं पुलिस अधिकारी हैं, न्यायाधिश आदि हैं।
आज जो भी हालात हो रहे हैं उसमें किसी एक का हाथ नही हम सब उसमें साहयक हैं।
और उससे मुक्त भी हम ही कर सकतें हैं। अन्यथा आज एक स्कुल में घटना हुई है कल देखना आपके सामने होगा। भाईयों मैं तो इस हालात को देखकर दुखी होता रहुंगा और जितना भी हमसे होगा करते रहेंगे।
अब वो समय आ गया है जब उस लहर की आवस्यकता है जो इस सारी भ्रष्टता अश्लीलता हिंसा और अनैतिकता की गंदगी को उङाकर ले जा सके।
जय श्री कृष्ण
शिवा तोमर-9210650915

सोमवार, 7 सितंबर 2009

दिव्य अनुभुति



मैंने जीवन में इतना ध्यान किया, इतनी पुजा की बहुत अच्छा लगा। और बुरे से बुरा वक्त युं कट गया कि पता ही नही लगा। यह सब ध्यान और पुजा पाठ का ही परिणाम
था। और मेरा चिंतन मनन भी बहुत हो गया। ऐसी ऐसी परिस्थिती भी मेरे सामने आयी
लेकिन प्रभु की कृपा ऐसी रही की में कभी भी विचलित नही हुआ परेशान नही हुआ। और सुबह गीता पाठ करना ध्यान करना तो मेरे जीवन का मानो एक हिस्सा बन गया हो। लेकिन एक दिन घर पर भगवती कथा पढ रहा था तो उसमें भागवत का भी वर्णन है। उसी में मैने नारद जी के पुर्व जन्म का किस्सा पढा। की कैसे पांच वर्ष के बालक की संतो के सत्संग से लग्न लगी और जब संत उनके गांव से जाने लगे तो नारद जी से नही रहा गया तो पिछे पिछे भाग लिए। जब संतो के गुरू ने देखा नारद जी को अपने पास बुलाया। और उन्हें ध्यान बताया की किस तरह से करना है। और फिर कहा की श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा,,, इससे बढकर संसार में कोई मंत्र नही है। तो मैं उस पुस्तक को पढ रहा था। और मुझे लग रहा था कि जैसे वह संत मुझे ही ज्ञान ध्यान करवा रहा हो। मेरा रोम रोम ध्यान की तरंगो से खिल उठा। और महसुस हुआ कि नन्द लाल श्यामसुन्दर कन्हैया मेरे पास ही है। मैं पुस्तक को एक तरफ रखकर
अंदर कमरें में लेट गया और अपने आप पता नही क्या हुआ आंसु निकलने लगे। चेहरा लाल और शरीर में कम्पन हो रहा था। अंदर से एक आवाज निकली ओ नंदलाल मुझे भी माखन दो। बार बार यही आवाज निकल रही थी। कहां हो कन्हैया कहां हो मेरे श्याम मुझे भी माखन दो। मुझे ऐसा अनुभव हो रहा था। जैसे श्याम कहीं छिपे हैं। और मैं उन्हें ढुंढ रहा हुं खोज रहा हुं। उस पल मुझे कुछ भी नही पता कि मैं कहां हुं दिन है या रात है, कमरें में प्रकाश है या अंधकार। मैं बार बार कोशिश करता हुं कि कुछ याद आये
कि कैसे था उस समय जिससे मैं कुछ उस पल का वर्णन लिख सकुं। भाईयों कुछ पल तो ऐसे भी आये अंत में कि मुझे ये भी नही पता लगा कि मन कुछ बोल भी रहा हा है या नही। अब मैं सारा सार समझ कि वह तो कुछ समय की कुछ पलों की झलक थी। प्रमेश्वर की सत्य की जहां पर कुछ ना तो सुनाई दे ना दिखाई दे ना शरीर का मालुम हो। जहां पर हमें स्थुलता का यानि कि इस शरीर का ज्ञान होगा तब तक सत्य की जानकारी नही होगी। कुछ लोग तर्क बाजी के लिए बातें बना देते हैं कि शरीर बिना कुछ नही होता अगर नाव नही होगी तो इस संसार समुंद्र को कैसे पार करेंगे। लेकिन दोस्तों यह मेरा अनुभव कि मुझे नही पता क्या झलक थी जैसे मैंने लिखा है। कुछ पलों तक तो सारा शरीर तरंगीत रहा, फिर मन ने पुकार की लेकिन बाद में पता नही क्या हुआ। जहां पर शरीर, मन और बुद्धि काम करना बंद कर देतो वहीं से सत्य का रास्ता शुरू होता है। और मुझे नही लगता की कोई इससे आगे लिख पाता होगा। और हो सकता है कि मेरे अंदर इतनी सामर्थ्य ना हो जो मैं उस वेग को सहन कर पाता। उस दिन के बाद भी मैंने ध्यान किया पुजा की लेकिन वह झलक नही मिली। मैं वह झलक पाने की बहुत प्रयत्न कर रहा हुं। लेकिन मुझे इस बात का भी ज्ञान है कि जब तक किसी भी प्रकार का प्रयत्न या कोशिश होगी तो तब तक उस दिव्य आन्नद का अनुभव नही होगा। वह तो जब भी होगा स्वत: ही होगा। लेकिन मन तो पागल है जो एक बार अच्छी चीज देख लेता है उसे बार बार याद करता है। अब तो मैं और भी कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा,,, का जप करता हुं। इसमें भी एक असीम आन्नद है शांति है। मैं तो अब लिखते लिखते भी आन्नद में सराबोर हुं। लेकिन उस दिन के बाद वो झलक वो आन्नद ना तो मैं देख पाया हुं ना लिख सकता।
जय श्री कृष्ण
शिवा तोमर