गुरुवार, 1 अक्टूबर 2009

बापु को श्रद्धांजली



सुबह से ही हर अखबार में न्युज चैनल पर बापु को श्रद्धांजली दी जा रही है। सरकार 2 अक्तुबर को इतना खर्च देगी की हमारे सैंकङो गरीब परिवारो को खाना मिल सकता है। जगह जगह बहुत बङी बङी सभायें होगी। सारे नेता बयानबाजी करते देखे जायेंगे बापु प्रतिमा पर पुष्प चढायेंगे। उनके जीवन की चर्चा करके उनके कार्यों की सराहना करके एक दुसरे को हम सबको उस पर चलने के लिए कहेंगे। और कार्यक्रम खत्म हुआ कोन बापु कोन गांधी सब भुल जायेंगे।
क्या यही मकसद था बापु का कि मेरे मरने के बाद मेरे नाम पर पैसा बहायें और सभाएं करके भाषणबाजी करें।
क्या सोच रहे होंगे बापु रो रहें होंगे कहीं कोने में खङे होकर।
कहीं उनके चष्में की बोली लग रही हैं कहीं किसी और सामान की। सबसे पहले तो ये देखो की बापु ने हमारे लोगो को क्यों नही दी सारी अपनी चीजें जो आज विदेश में बौली लग रही है। अगर इस लायक समझते तो अपने बच्चों को ही देते। कोन पिता चाहता है कि उसकी कोई भी वस्तु किसी दुसरे के घर जाये।
लेकिन दोस्तो बापु को किसी भी चीज से आसक्ति नही उन्होने तो अनासक्त जीवन जीया है। 1892 के करीब बापु 300 रूपये प्रतिमाह कमा लेते थे। क्या कमी थी उनके पास वो भी हम सबकी भांति मोज ले सकते थे। ऐसो आराम का सब सामान तो था ही अपने परिवार के साथ आन्नद से जीवन जी सकते थे।
आज के नेता जो देश को चला रहे हैं जो आज के दिन बापु को पुष्प अर्पित करके श्रद्धांजली देंगे। अगर उनको उनकी पसंद का बंगला नही मिलता तो रहते नहीं। जिस देश में गरीब किसान रोज आत्म हत्या कर रहे हैं। आये दिन ना जाने कितनी मासुमों की चीख से दिल दहल उठता है। पता नही कितनी अबोद्ध बच्चीयां भेङियों की हवस की शिकार हो रही हैं। ना जाने कितने हिंसा का शिकार हो रहे हैं।
वहीं इन सब हालातों से बेखबर हमारे देश के नेता फाईव स्टार होटलों में कई कई महिने मोज करते है।
उनको तो बस आज मौका प्रप्त हुआ है। उस आदमी की प्रतिमा पर फुल चढा रहे हैं जिन्होंने अपनी गरीब जनता की हालात देखी। एक बार बापु सुना है कि उङीसा में चले गये वहां देखा कि औरतों के पास बदन ढांपने के लिए कपङा तक नही है। तो बापु की आंखों में आंसु आ गये। और क्या किया जरा ध्यान देना देश के नेताओं वो कहीं फाईव स्टार में नही गये। जो बापु दो सुती धोती लपेटते थे उनमें से एक को किसी महिला को ओढने के लिए देकर स्वयं एक धोती के दो टुकङे करके एक को लुंगी की जगह बांध लिया तो दुसरे भाग से शरीर के ऊपर के हिस्से को ढांप लिया। ये थे बापु गांधी।
मेरी तो समझ ही नही आ रहा कि मैं उन्हें क्या अर्पित करूं। मेरे पास क्या है उस महान पुरूष को देने के लिए। जिन्होंने अपना ही नही परिवार को भी इस देश को समर्पित कर दिया था। मां कस्तुरबा गांधी कितने दिनों जेल में रही और सुना है कि अंतिम सांस भी जेल में ही ली है। क्या कसुर था उनका क्या पङी थी बिना बात इतना कष्ट उठाने की।
70-75 साल की वृद्धवस्था में आराम करने के दिन फिर भी अन्याय और अत्याचार का पुरजोर विरोध किया और नमक उठाकर नये कानुन की खिलाफत की।
आज बापु मात्र किताबों तक ही सिमित रह गये हैं या फिर भाषणो में। 2 अक्तुबर को विस्व अहिंसा दिवस मनाया जाने लगा। लेकिन क्या विस्व में अहिंसा है। सारी दुनिया उस महान पुरूष को मान रही है। फिर ऐसा क्या है जो बढती हिंसा पर काबु पाने में नाकाम हो रही है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि एक आम आदमी मोहनदास कर्मचंद गांधी को ऐसा कोनसा पारस प्राप्त हुआ था जिससे लोग उन्हें बापु, राष्टपिता कहने लगे और उनकी महानता के ऐसे दीवाने हुए की उस वृद्ध शरीर जिसमें ताकत सिर्फ चलने के लिए ही थी उनके पिछे पागलों की तरह जनता चलती थी। उनके मुख से निकला एक एक शब्द्ध को गुरूमंत्र की तरह मानते थे।
दे दी हमें आजादी बिना खङग बिना ढाल,, साबरमति के संत तुने कर दिया कमाल।
कोनसा सुत्र था वो जिससे उन्हें कभी किसी भी चीज से आसक्ति नही हुई। अनासक्त रहे।
कहां से प्राप्त हुआ सत्य और अहिंसा का मार्ग जिसकी वजह से बापु ने सत्याग्रह किये।
बापु के वाक्य हैं कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। इस बात को भुलकर लोग उन पर फुल चढाने में लगे हैं उनके चस्में उनकी लाठी के पिछे पङे हैं। अरे पागलों नादान भाईयों बापु के जीवन में ही वो रास्ता है वो संदेश है जिसको हम उन्हें श्रद्धांजली दे सकते हैं।
जय श्री कृष्ण
शिवा तोमर-9210650915

बुधवार, 16 सितंबर 2009

हम तुमसे जुदा होके मर जायेंगे रो रोके



कई वर्षों पहले किसी फिल्म में के गाने में सुनी थी ये पंक्ति कि मर जायेंगे रो रो के। कितना प्रेम दिखाया गया है। कि जुदा हुए तो मर जायेंगे। कैसा अनुठा नाता है। एक दुसरे के प्रति ऐसा भाव इतना प्रेम की आंखो में आंसु और दिल से आह निकल रही है। ये पंक्ति दिल की गहराई से लिखी गयी है। हर आदमी अपने विवेक के अनुसार ही इसका अर्थ निकाल रहा है। इससे संबंधित एक दृष्टांत आता है तुलसीदास जी के जीवन का। एक दफा उनकी पत्नि कई दिन के लिए अपने मायके चली गयी। तो वो उनसे मिलने के बैचेन हो गये तङप गये। जब उनकी जुदाई नही सही गयी एक एक पल काटना बङा ही भारी और दुखद लगने लगा और वही हालात हो गयी कि हम तुमसे जुदा होकर मर जायेंगे रो रो कर। तो वो रात को ही उठकर ही चल पङे। अंधेरी काली रात के सन्नाटे को चीरते हुए तुलसीदास जी कामांधाग्नि की ज्वाला में धधकते हुए पत्नि के मायके की तरफ चले जा रहे थे। रास्ते में एक बहुत गहरी नदी भी थी। जिसे पार करने बहुत ही मुशिकल था। तो अचानक उन्हें कोई चीज तैरती हुई नजर आयी तो वो उसी के ऊपर लपक कर चढ गये। उन्हे यह भी नही दिखाई दिया कि जिस पर बैठकर यात्रा कर रहे हैं वो तो लाश है। वह तो उस वेदना में जल रहे थे जिसने आंखे बंद कर दी थी। यानि की हम सब की आंखो पर अज्ञान का पर्दा डाल दिया। बस उन्हें तो पत्नि के पास पहुंचना था। नदी पार करके पत्नि के घर तक पहुंच गये। अब आगे कैसे जाये दरवाजा बंद सब सो रहे हैं इस बेवक्त जगा भी नही सकता। क्योंकि समाज की लाज शर्म भी तो होती है।
पत्नि के कमरे की खिङकी खुली दिख रही थी। लेकिन चढे कैसे वहां तक। उनकी किष्मत अच्छी थी रात को भी एक रस्सी लटकी नजर आयी तुलसीदास जी उसे ही पकङकर चढ गये। पत्नि ने देखा तो अचम्भीत हो गयी। उसे तो यकिन ही नही हो रहा था कि वो इतनी रात में आ सकते थे। उसने पुछा कि आप कैसे चढे तो तुलसीदास जी ने बङी सहजता से बता दिया कि आपके खिङकी के पास एक रस्सी लटक रही है। जैसे ही उसने आश्चर्य से देखा तो देखती ही रह गयी क्योकि वह रस्सी नही सांप था। उनकी पत्नि भी बहुत समझदार थी उन्होने एक बात कही जिसने तुलसीदास जी को ऐसा मार्ग दिखाया जिससे आज सारा देश ही उन्हे याद करता है। उन्होने कहा था कि
जितनी नियत हराम में उतनी हर में होय,
तो चला जा बैकुंठ को पल्ला पकङे ना कोई।
भाईयों ये वही मार्ग है जिसकी जुदाई में सारा जीवन रोते रहते हैं और मर जाते हैं। लेकिन हम सब अपनी तुच्छ और संकिर्ण मानसिकता के कारण उन नेत्रों से इसका दर्शन नही करते। जिसका रास्ता तुलसीदास जी की बीबी ने दिखाया था। लेकिन हमने हम सबने अपनी सुविधा के अनुसार ही इसका वर्णन किया। कोई अपनी बीबी की जुदाई में रोता रहा तो कोई अपनी प्रेमिका के गम में कोई धन के वियोग में मर रहा है तो कोई किसी की जुदाई में।
हर व्यक्ति के अंदर से आवाज निकलती है कि तु अपने प्रियतम से बहुत लम्बे समय से बिछुङा हुआ है। और उसी की जुदाई में ही कभी इधर कभी उधर भागता रहता है रोता रहता है। यही तो इतने जन्मों से होता आया है लेकिन क्या करे जहां हमें अपने प्रेमी को खोजना चाहिए वहां तो खोजते नही और बस किसी और से ही अपना काम चलाने की सोचते हैं। कुछ समय तक तो हमें शांति सी मिलती है लेकिन वह शास्वत नही है ध्रुव नही है। वो तो अनित्य है क्षणिक है।
किसी किसी के अंदर थोङी सी चेतना आती है तो वह अपने दिल की तङप को कागज पर लिखकर ही शांत कर लेता है। हम तुमसे जुदा हो के मर जायेंगे रो रो के,,,,,,, और इसे ही गाते रहते हैं। इससे तृप्ति तो होती नही लेकिन जैसे किसी मरीज को नींद नही आती है और दवा देकर डाक्टर लोग थोङा आराम दे देते हैं बस यही हम सब कर रहे हैं।
हम थोङी थोङी सी शांति को वही समझ जाते हैं जिसकी जुदाई में रो रो के मरते रहते हैं। हमें उसे ही खोजने का प्रयत्न करना चाहिए।
जय श्री कृष्ण
शिवा तोमर-9210650915