आज सारी दुनिया भुखी है प्यासी है यह नही सोचना कि मैं रोटी की बात कर रहा हुं या जल वाली प्यास की बात कर रहा हुं। किसी के पास धन, दौलत, पैसा, सोहरत, ताकत, किसी चीज की कमी नही है लेकिन फिर भी सारी दुनिया अधुरी सी है जैसा कुछ छिन गया हो।
मैं बात कर रहा हुं सुख, शांति, चैन, सद्धभावना, प्रेम, एकता, सुरक्षा, और अभयता की जो आज दुनिया से ये समझो की उठ ही गयी है कहीं नामोनिशान भी नही रहा स्वार्थ की ज्वाला ने इसे जलाकर खाक कर दिया।
सब लोग चाहे कोई किसी भी जाति को हो या किसी भी देश का हो वो असुरक्षा भय और अशांति में जी रहा है।
यही कारण है कि आज आये दिन हर देश और जगह जगह सभाओं का आयोजन किया जाता है और हर एक का मुद्दा यही रहता की आतंक, हिंसा, व्याभीचार, और अनैतिकता पर कैसे अंकुश लगे। तो एक कमरे में बैठते भी है लोग सेमिनार करते हैं और बङे बङे गहरे गहरे चिंतन करते हैं और तालियां की गङगङाहट भी बहुत होती है एक दुसरे की तारिफें भी बहुत होती हैं, लेकिन जिस मकसद से सभा हुई उसकी प्राप्ति हुई क्या?
लोग चिल्लाते हैं अहिंसा के लिए, गला फाङते हैं अपराध मुक्त भारत के लिए, बात करते हैं विस्व शांति स्थापना की...... इतनी सभाएं होने के बाद और इतना धन इन सभाओं के नाम पर बर्बाद होने के बाद क्या हम अपने अभियान में सफल हो पाये ? ? ?
ऐसा भी नही है कि इनकी आवस्यकता सिर्फ उन्हीं लोगो को है जो सेमिनार में बैठे है जो भाषण दे रहे हैं यह बिलकुल नही है इसकी जरूरत तो हर किसी को है लोग उस सभा को जो इतने गम्भीर मुद्दे पर हो रही है उसको अपने घरों में टीवी के जरिये देखते है और एक जिज्ञासा रखते हैं कि शायद इसी बार कोई परिणाम निकल जाये लेकिन फिर वही पुरानी बात तालियां और लिखा लिखाया बोलना कि अगर ऐसा हो जाये तो ये हो सकता है अगर हम सब एक बार इस रास्ते पर चल सके तो यह संभव है और जो भी ऐसी बातें कहता है उसके पिछे तालियां बजाने वाले बहुत होते हैं। इसी तरह सभा का समापन हो जाता है निष्कर्ष के नाम पर समस्या जस की तस रही। और सारे हम जैसे लोग एक बार फिर निराश और हताश होकर अपना टीवी बंद कर देते।
तो बात चल रही थी बढती हुई हिंसा, अत्याचार, अन्याय, असुरक्षा, भय और अशांति की। कहने का र्थ है कि व्यक्ति के पेट में जव भुख नही लगती तो उसे कभी भी बोजन की याद नही आती खाने की चाह नही होती जब तक प्यास नही लगती तो पानी की किमत का पता नही लगता अर्थात जिस वस्तु की अभाव होता है उसी की मांग बढती है। अब सारे संसार में सारी दुनिया में अंहिसा,शांति और सुरक्षा का अभाव हो चुका है अगर कहा जाये ये सब अपने अंत की स्थिती में हो बेहतर होगा। जब भुख लगती है तो बच्चा रोता है उसे खाने के लिए पेट की भुख शांत करने के लिए रोना पङा गला फाङकर चिल्लाना पङा जब आकर मां ने दुध पिलाया। आज उसी तरह से हर व्यक्ति रो रहा है देश रो रहा है विस्व गला फाङकर चिल्ला रहा है लेकिन इन सबका कोई लाभ नही हो रहा है। जितना हम चिल्ला रहे हैं उतने ही ये सब हमसे दुर होती जा रही हैं। बङे चिंतन का विषय है। हम सबके सामने एक उदाहरण है कि हर शाराब की बोतल पर लिखा होता स्वास्थ के लिए हानिकारक है, बीङी सिगरेट तम्बाकु गुटखा सभी के ऊपर मोटे शब्द्धों मे छपा होता है कि इनसे कैंसर होता है लेकिन इन सबका व्यापार दिन दुना रात चौगुना बढ रहा है। लोगो ने लिखा खुब किताबें लिखी पर्चें भी बंटवायेनशा मुक्त रहो नही तो फेफङे खराब हो जायेंगे, लेकिन किसी के ऊपर भी इन लिखी पोथियों का कोई प्रभाव नही पङा।
महात्मा गांधी को शांति का दुत मानने लगे कहा गया है सत्य और अहिंसा का मार्ग उन्होने ही दिया तो क्या पता उनके ही नाम से लोगों को शांति मिल जाये अहिंसा के रास्ते पर चलने लगे संसार में हिंसा ने अपना शिकंजा ऐसा कसा की दुनियाभर के देश गांधी जी के जन्म दिन को विस्व अंहिसा दिवस के रूप में मनाने लगे लेकिन हिंसा रूके ते क्या इस बढती आग पर अंकुश तो क्या ये और ज्यादा भयानक रूप से भङकने लगी। लोग बैचेनी और विवशता का चौला ओढे अभी भी किसी चमत्कार का इंतजार कर रहे हैं इस दुनिया में कोई कृष्ण, श्री राम, ईशा सुकरात आयेगा और हिंसा आतंक और अपराध को रोककर राम राज्य की स्थापना करेगा। भगवान के उस श्लोक को याद करते हैं जो महाभारत के समय अर्जुन को बताया था कि धर्मसंस्थपनार्थाय संभवामि युगे युगे। की जब भी धरती पर अधर्म बढेगा तो में साकार रूप से प्रकट होकर रक्षा करूंगा बस अब तो उन्ही का इंतजार है।
लेकिन इस बात पर विचार नही करते की इतनी सभाओं और शिक्षा तथा प्रचार प्रसार के बाद भी हमें शांति सुरक्षा और अभयता नही प्राप्त हो रही इसका सबसे बङा कारण है कहते कुछ हैं और कर कुछ और रहे हैं।
आप ये नही सोचना कि मैं किसी एक की बात नही कर रहा मानव जाति की बात कर रहा हुं। किसी भी बीमारी का ईलाज करने के लिए उसकी तह में जाना होगा गहराई में जाना होगा खोजना होगा ये स्थिती पैदा कैसे हुई इसमें किसी का भी नही हमारा ही हाथ है। मान लो किसी को बुखार है बदन तप रहा है जल रहा है और हम उसको जानने की कोशिश नही करें ये नही जाने की इसका कारण क्या है और हम जिसको बुखार हुआ है जो बदन जल रहा है उसे पानी से नहलाकर ठंडा करने लगे तो कैसा रहेगा। हम सब भी वही कर रहे हैं और कोस रहे हैं एक दुसरे को कि महिलाओं पर अत्याचार क्यों हो रहा है? ? क्यों वहशी बच्चियों को अपनी हवश का शिकार बना देते है? ? आदमी कैसे बन जाता है संहारी? ? क्यों इस दुनियां में आतंक और हिंसा लोगो को बना रही है अपना निवाला। इसकी गहराई में जाकर तह में जाकर खोज नही करते और ऊपर से ही पानी डालकर धोने का प्रयत्न करके ही समस्या से मुक्ति पाने की इच्छा करते हैं।
इस बात पर चिंतन नही करते ये घातक बीमारी जो आज इतना विकराल रूप ले चुकी है ये एक दो दिन या वर्षों की नही बल्कि सदियों की लापरवाही का कारण है।
थोङा समझने का प्रयत्न करें की मान लो हमने एक बीज बोया तो जैसा बीज होगा उसका पेङ भी वो ही होगा ना ऐसा ही होगा। तो चिंतन करने वाली बात ये है कि जब एक मानव का बीजारोपण हुआ तो बीज कैसा था हम लोग लगे रहते हैं पेङ को ऊपर से साफ करने में उसकी जङ में पानी नही डाल रहे जङ की निराई गुङाई नही कर रहे। बीज जैसा बोया फल भी वैसा ही होगा अगर वह बीज क्रोध की खाद या वासना क्रुरता और अंह की मिट्टी में खाद पानी मिलाकर अज्ञानता की जलवायु में बोया गया है तो पेङ भी ऐसा ही होगा। वही मानव जब रूप लेकर पेङ बनेगा तो उसमें से प्रेम की छाव नही निकलेगी बल्कि नफरत घृणा वासना क्रोध और अज्ञानता की ज्वाला ही निकलेगी।
और हम सोचने लगे की उस पेङ को पर्चें बंटवाकर किताबे लिखकर उन्हे सुनाकर उनसे अंहिसा की उम्मीद करे शांति की इच्छा करें एकता की कामना करें। तो हमारी बङी भुल है। सभी सभाओं का मकसद स्वार्थ अपना स्वार्थ सिद्ध करना अपना उल्लु सिधा करने में लगे रहते हैं कोई अपनी राजनीति में तो कोई धन लोलुपता में लेकिन असली बात किसी तक नही जाने देते। समय आ गया है हम सबको सावधान होने का और जागरूक होकर इस बीमारी से निजात दिलाने का।
आप भी इस बात पर अपना दिमाग लगायें कि ऐसा क्यों हो रहा है? ? क्यों नही किसी भी सभा का कोई प्रभाव नही हो रहा ? क्यों सब निरर्थक हो रहा है? ? क्या इस तरह बंद कमरे में बैठकर सभाए करके युवाओं को अपराध मुक्त किया जा सकता है? ?
क्या लिखकर या कहीं से रटकर लोगों के सामने बोलने से इस घातक बीमारी से निजात मिल सकती है? ?
कल लिखुंगा इसकी जानकारी------------ जय हिंद
शनिवार, 24 जुलाई 2010
रविवार, 20 जून 2010
हत्यारों को क्यों नही आता रहम.....

मैं और मेरे साथ दो लङके कहीं सुनसान जगह पर खङे हैं और एक गाङी आयी। गाङी को देखते ही मेरे साथ का एक लङका कहने लगा कि भाई इसी ने मुझे मारा था आज हम इसको नही छोङेंगे। और हमने वो गाङी रूकवा ली उसमें जो भी बैठा था उसको खिंचकर निचे गिरा दिया उसने कहा कि मुझसे क्या गलती हुई मुझे क्यों मार रहे हो। लेकिन उसकी बात किसी ने नही सुनी जब तक थप्पङ से काम चला तो चलाया उसके बाद उसी की गाङी में रखे पेचकस से हम लोग उसे मारने लगे वो चिल्लाता रहा कि भाई मैंने आपका क्या बिगाङा है मेरे तो छोटे से बच्चे हैं, बुढे मां बाप हैं उनका कोन करेगा, लेकिन पता नही कहां चली गयी दया क्यों इतने बेरहम हो गये कि उस खुन से लथपथ की कोई भी गुहार कोई भी चीख दया की भीख का कोई असर नही हो रहा और उसकी पेचकस से गोद गोद कर उसकी हत्या कर दी अब वह बेचारा सङक पर पर पङा आंखे बहार सङक पर भी खुन की धारा बहने लगा। हममें से एक ने कहा कि भाई पुलिस आ गयी और सारे भाग खङे हुए बस भागे जा रहे थे अब हमें अपनी जान के लाले पङ रहे थे। और हम भागते भागते बेहाल से हो गये सांस धोंकनी की तरह से चल रही थी और पता नही कहां कहां से निकलते हुए खेतों में जंगलो में से होते हुए पता नही कहां भागे जा रहे थे। सारा बदन पसिने पसिने हो रहा था। गला सुख रहा था और भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि भगवान आद बचा लो। मैं हङबङाकर उठा मेरा भाई कहने लगा की क्या बात है बहुत डरे से हुए से लग रहे हो चेहरा पीला पङा हुआ है। मैं उसे क्या बताऊं की सपने में हमने किसी को बङी निर्दयता से मार दिया। मैंने कहा कुछ नही पानी दे दो ये बात रात के करीब 2 बजे की थी। मेरा भाई तो बेचारा पानी देकर सो गया लेकिन मैं नही सो पाया सारी रात पता नही कितने विचार मन में दोङते रहे।
सबसे पहले तो दिमाग में ये बात आयी की आदमी इतना बेरहम क्यों हो जाता है कहां से आ जाती है इतनी कट्टरता इस मासुम दिल में, चाहे कोई कितना भी गिङगिङाता रहे रहम की फरियाद करता रहे लेकिन कोनसी शक्ति इसके अंदर आ जाती है जिससे उससे किसी की कोई भी चीख पुकार नही सुनती।
और दुसरी बात ये आयी की जब इतना बहादुर निडर और बलवान है तो जब अपनी जान पर पङी तो क्यों कुत्ते की तरह भागता फिर रहा था ये बात मैंने सिर्फ सुनी थी कि बुरे कर्म करेगा तो कुत्ते की तरह भागता फिरेगा लेकिन मैने इसे देखा है और अभी भी ऐसा लग रहा जैसे कि सच में घट रहा हो। अब कहां गयी वो सारी ताकत पानी पीने के लिए भी समय नही है और भागे जा रहा है अपने को बचाने के लिए।
इन दोनो बातो ने मुझे सारी रात नही सोने दिया क्या करूं इतनी बैचेनी रही की लिख नही सकता।
मैं इसे इसलिए लिख रहा हुं कि कहानी की तरह से नही पढें यही तो आज सारी दुनिया में हो रहा कोई कितना भी मजबुर हो दुखी हो और किसी के पास भी चला जाये कितना भी रोता रहे लेकिन कोई नही सुनता बस अपने स्वार्थ में अंधे हो रहे हैं आंखो पर ऐसा चश्मा चढा रखा है कि कोई नही दिखता। और ऐसा नही है कि ये पल किसी एक पर नही आता जीवन में कभी ना कभी प्रत्येक के ऊपर आता है लेकिन अपने ऊपर जब पङती है तो सुनता ही नही। बस सावधान हो जाओ जो आज हमारे सामने कोई गिङगिङा रहा है कल हो सकता है कि हम भी किसी के सामने खङे हों और अगर वो भी हम पर रहम नही करेगा तो दुनिया में कितनी भयावह स्थिती हो जायेगी। जय हिंद
शनिवार, 12 जून 2010
लेखको से एक अपील..........
ब्लोग जिसे हम अपने विचार ज्यादा से ज्यादा लोगों तक भेज सकें वो एक माध्यम था। लेकिन कुछ लेखकों की तुच्छ और संकिर्ण मानसिकता ने ब्लोग को इतना गंदा कर दिया पढें तो क्या देखने का भी मन नही करता। एक अच्छा लेखक वो ही होता है जो अपनी कलम के माध्यम से समाज में एकता अखंडता और भाईचारा बनाने में साहयक हो अपनी किसी भी लेखनी से दरार मत डालो। किसी ने भगवान को देखा है ना अल्लाह को तो हम क्यों एक दुसरे पर किचङ फैंकते रहते हैं। कोई देवी देवता पीर पैगम्बर हमारा कोई लाभ नही कर सकता। अगर कोई आग के ऊपर हाथ रखे और याद करो किसी भी पैगम्बर को तो भी हाथ जलने से नही बच पायेगा। हमें स्वंय ही अपने विवेक से भङकी हुई आग से बचना है। मत बनो वो चिंगारी जिससे समाज से प्रेम,सहानुभुति और दया विस्वास नाम की चीज जलकर राख हो जाये और आपसी भाईचारा जो दिन पर दिन खत्म होता जा रहा है। उसमें हमारी कलम और लेखनी का बहुत बङा हाथ है। मैंने कई ब्लोग पढे कोई हिंदूओं पर कालिख पोतने की कोशिश करते हैं, तो कोई मुस्लिमों का मुंह काला करने के पिछे पङे रहते हैं। दोस्तो आप एक बात बताओ अगर हममें से कोई चाहे कि सुरज पर गंदगी फैंक दे इस हमारे पागलपन से सुर्य पर कोई असर नही पङेगा लेकिन हमारे अंदर द्वेष नाम की बीमारी अपने पैर पसारती चली जायेगी। और यह एक ऐसा शत्रु है कि आज राम पर मेहरवान है तो कल खान साहब पर भी कुर्बान हो सकता है। आपसे एक अपील है कि आज के बाद कोई भी ब्लोग ऐसा ना लिखें जो किसी को आहत पहुंचे। अगर किसी के अंदर ज्यादा द्वेष, घृणा और नफरत भरी पङी हो तो मुझसे फोन पर बात कर और अपनी सारी घृणा क्रोध मुझ पर निकाल दे। जिससे सैंकङो लोग इस नफरात की आग में ना झुलसें। हमारे ऊपर तो ऐसा कवच है कि किसी भी नफरत की ज्वाला का कोई असर नही होता। जय हिंद जय भारत
गुरुवार, 10 जून 2010
तलाक हुआ आसान------
तलाक हुआ आसान------
वाह भई क्या कहना हमारी अदालतों में इतने मुकदमें पैंडिंग पङे हैं इतने अरबों के घोटाले इतनी हत्याओं के दोषी जिनको फांसी तक सुना रखी है इतनें आतंकवादी लेकिन उन मुकदमों पर कोई फैसला नही उनकी किसी को कोई चिंता नही और ऐसे फैसले जिससे समाज में अराजकता बढे दुरियां बढे उन पर सरकार का ध्यान आजकल कुछ ज्यादा ही है। घरों में लङाई झगङे तो सनातन काल से होते आये हैं लेकिन भारत देश के संस्कार परम्परा और आदर्श ऐसे बनाये थे कि उन सब झगङों तकरार को एक किनारे करके फिर भी घर बसे रहते थे। लेकिन एक और रास्ता साफ कर दिया कि अगर पति पत्नि आपस में खुश नही हैं और काफी समय से अलग रह रहे तो वो तालाक ले सकते हैं। कितना सुंदर फैंसला दिया है। लोगो में खुशी की लहर दोङ रही है सब खुश हैं। अब शादी का बंधन प्रेम का नही रहेगा अगर किसी को भी थोङी सी परेशानी हुई तो तलाक........... ये काम थे समाज के कि चार आदमी बैठकर उन्हे समझाते थे कि अगर तुम्हारी नही बन रही है तो और अगर दुसरे के साथ शादी करोगे तो जरूरी नही है कि खुश रह सको तो ये कोई विकल्प नही है खुश रहने का और ग्रहस्थी को सही चलाने का।
पहले सरकार अगर किसी अदालत में कोई मुकदमा जाता था कि तलाक चाहिए तो अदालत कहती थी तुम्हें एक ओर मोका दिया जाता है 6 माह एक साथ रहो। और जो फैंसला गुस्से की घङी में लिया गया हो उन 6 माह में बदल भी सकता था।
इस फैसले के बाद लीव इन रिलेशनशिप का करेज बहुत बढेगा सरकार एक के बाद जैसे सिढी बना रहे हो उन रास्तों की अङचने साफ कर रहे हैं जिसको हम कभी लाज शर्म और हया कहते थे। लीव इन रिलेशनशिप. समलैंगिकता जिसे सरकार ने पहले से ही मान्याता दे दी है उसकी तरफ हमारे युवा भाई झुकेगे। मेरी समझ में ये नही आया की आखिर ये सरकार चाहती क्या है। भोपाल गैस त्रासदी के फैंसला सबके सामने है अजमस का फैंसला सबके सामने है इन पर बिलकुल भी चिंतित नही है फिक्रमंद है तो बस उन मुद्दों पर जिससे हमारे युवा कमजोर हो व्याभीचारी बने।
हिंदूओं में तलाक को पाप समझा जाता रहा है और हर पत्नि की यही इच्छा रही है कि सात जन्म तक साथ निंभाना है और अपने पतियों को करवा चौथ पर भगवान की तरह से पुजती हैं। अदालत को चाहिए था उन करोङो महिलाओं का हवाला देकर कोई फैसला करना चाहिए था जो भुखी सुखी रहकर भी अपने पति के साथ हर दुख सुख की घङी में कंधा से कंधा मिलाकर चलती थी। लेकिन इस आधुनिकता और पश्चिम विचारों से ग्रसित लोगो के कारण पति को छोङना और नयी बीबी रखना अब तो कोई दिक्कत ही नही रही चाहे 50 शादी कर ले हर 6 माह बाद तलाक दो। मैं तो बहुत दुखी हुं क्या करें।
वाह भई क्या कहना हमारी अदालतों में इतने मुकदमें पैंडिंग पङे हैं इतने अरबों के घोटाले इतनी हत्याओं के दोषी जिनको फांसी तक सुना रखी है इतनें आतंकवादी लेकिन उन मुकदमों पर कोई फैसला नही उनकी किसी को कोई चिंता नही और ऐसे फैसले जिससे समाज में अराजकता बढे दुरियां बढे उन पर सरकार का ध्यान आजकल कुछ ज्यादा ही है। घरों में लङाई झगङे तो सनातन काल से होते आये हैं लेकिन भारत देश के संस्कार परम्परा और आदर्श ऐसे बनाये थे कि उन सब झगङों तकरार को एक किनारे करके फिर भी घर बसे रहते थे। लेकिन एक और रास्ता साफ कर दिया कि अगर पति पत्नि आपस में खुश नही हैं और काफी समय से अलग रह रहे तो वो तालाक ले सकते हैं। कितना सुंदर फैंसला दिया है। लोगो में खुशी की लहर दोङ रही है सब खुश हैं। अब शादी का बंधन प्रेम का नही रहेगा अगर किसी को भी थोङी सी परेशानी हुई तो तलाक........... ये काम थे समाज के कि चार आदमी बैठकर उन्हे समझाते थे कि अगर तुम्हारी नही बन रही है तो और अगर दुसरे के साथ शादी करोगे तो जरूरी नही है कि खुश रह सको तो ये कोई विकल्प नही है खुश रहने का और ग्रहस्थी को सही चलाने का।
पहले सरकार अगर किसी अदालत में कोई मुकदमा जाता था कि तलाक चाहिए तो अदालत कहती थी तुम्हें एक ओर मोका दिया जाता है 6 माह एक साथ रहो। और जो फैंसला गुस्से की घङी में लिया गया हो उन 6 माह में बदल भी सकता था।
इस फैसले के बाद लीव इन रिलेशनशिप का करेज बहुत बढेगा सरकार एक के बाद जैसे सिढी बना रहे हो उन रास्तों की अङचने साफ कर रहे हैं जिसको हम कभी लाज शर्म और हया कहते थे। लीव इन रिलेशनशिप. समलैंगिकता जिसे सरकार ने पहले से ही मान्याता दे दी है उसकी तरफ हमारे युवा भाई झुकेगे। मेरी समझ में ये नही आया की आखिर ये सरकार चाहती क्या है। भोपाल गैस त्रासदी के फैंसला सबके सामने है अजमस का फैंसला सबके सामने है इन पर बिलकुल भी चिंतित नही है फिक्रमंद है तो बस उन मुद्दों पर जिससे हमारे युवा कमजोर हो व्याभीचारी बने।
हिंदूओं में तलाक को पाप समझा जाता रहा है और हर पत्नि की यही इच्छा रही है कि सात जन्म तक साथ निंभाना है और अपने पतियों को करवा चौथ पर भगवान की तरह से पुजती हैं। अदालत को चाहिए था उन करोङो महिलाओं का हवाला देकर कोई फैसला करना चाहिए था जो भुखी सुखी रहकर भी अपने पति के साथ हर दुख सुख की घङी में कंधा से कंधा मिलाकर चलती थी। लेकिन इस आधुनिकता और पश्चिम विचारों से ग्रसित लोगो के कारण पति को छोङना और नयी बीबी रखना अब तो कोई दिक्कत ही नही रही चाहे 50 शादी कर ले हर 6 माह बाद तलाक दो। मैं तो बहुत दुखी हुं क्या करें।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)