नरेंद्र मोदी एक ऐसा नाम जिसको लोग देश के भविष्य विकास हिंसा मुक्त समाज के रूप में देख रहे हैं। हम मानते हैं कि गुजरात में दंगे हुए थे और उस बारें में पता नही कोन कोन सी कमैटिया बैठाकर देख ली सरकार ने लेकिन परिणाम जस के तस। देश का दुर्भाग्य है कि यहां राजनीति जो होती है वो किसी मुद्दे को लेकर नही होती यहां पर होती है जाति के नाम पर धर्म के नाम पर सम्प्रदाय के नाम पर भाषा के नाम पर। यहां के नेताओं को विकास से कोई लेना देना नही है, कोई मरता मरो उन्हे चाहिए जो करोंङों खर्च करके जीते हैं उनसे 10 गुणा कैसे बने। मैंने तो आज तक मोदी जी का नाम किसी घोटाले में नही सुना। हां एक दिन जब उनका सद्भावना उपवास था तो मैं शुरू से ही देख रहा था मैं ही क्या सारा देश देख रहा था। वो उपवास पर बैठने से पहले अपनी मां का आशिर्वाद लेने के लिए उनके निवास स्थान पर गये तो उस भोली और भारतीय मां ने इस सपुत को एक रामायण और 101 रूपया दिया था। और शायद उस दिन जी जन्मदिन था। क्या देश को ये दृष्य याद नही अगर यही जन्मदिन मायावती का या सोनिया जी होता तो आपको पता ही क्या भेंट दी जाती।
हां यह भी सत्य है कि मोदी जी सख्त शाशक है और यह होना भी बहुत आवस्यक है जो शाशक सख्त नही होगा मुलायम होगा वहां पर व्यवस्था बिगङती ही रहेगी देख लो देश का हाल। और भगवान ने गीता में भी कहा है हे अर्जुन शाशन करने वालों में यमराज हुं में……. तो यह भी कोई गलत नही है। यह काल अंधकार का काल है लुट खसोट का समय है सब सोचते हैं कि किसी भी तरह से धनादि का संग्रह कर लो पता नही कल क्या हो हम सरकार में दोबारा आये या ना आये। मोदी जी के गले में हमने तो आज तक नोटो की माला नही देखी। और जैसा मैंने सुना है कि उनके खाते में एक या दो लाख से ज्यादा रूपये भी नही होंगे। तो ऐसे आदमी पर क्या हम उंगली उठा सकते हैं। जब भ्रष्ट लोगों को उनके खिलाफ कुछ नही हाथ लगता तो 2002 के दंगो की चिंगारी से उनका बेदाग सफेद कुर्ते को जलाने की सोचते हैं लेकिन उन मुर्खों को नही पता कि उस सफेद कुर्तें वो शील वस्त्र है जो प्रहलाद को होली की आग के अंदर से भी सुरक्षित निकाल लाया था।
दंगे में काफी लोग मारे गये थे लेकिन जो लोग अयोध्या से आ रहे थे उनको कोई नही याद करता जिन बेचारों को रेल के अंदर जिंदा जला दिया गया था, हां उनको याद करके अपना वोटबैंक भरने की योजना बनाते रहते हैं जो असली दंगे में मारे गये थे कोई भी दंगा एक तरफ से नही होता। वो तो मोदी जी की समझदारी देखो की किस तरह से हालातों को सुधारा और उसके बाद में आज तक कोई कर्फ्यु नही लगा वरना वहां के हालात ऐसे थे कि आये दिन बंद करना पङता था।
जो लोग दंगे में मारे हुए लोगो की दुहाई देकर कहते हैं मोदी दोषी है उनको किसी से कोई लेना देना नही है बस वोटों की आग है।
हिंसा तो हिंसा है उसमें कोई यह नही देखता कि मरने वाला कोन है।
और एक सबसे बङी बात देखो राजनीति की एक बदमाश जिसकें आतंकियों से नाता था दर्जन भर से भी ज्यादा केस चल रहे थे सोहराबुदीन उसका एनकाउंटर हुआ उस केस में 3 आई पी एस अधिकारी और एक मंत्री को जेल जाना पङा। मैं तो आपसे ही पुछता हुं कि अपराध हिंसा अन्याय अत्याचार खत्म करना गलत है क्या ……… अगर गलत है तो मोदी भी गलत है
मंगलवार, 19 जून 2012
मोदी जैसा कोई नही........
नरेंद्र मोदी एक ऐसा नाम जिसको लोग देश के भविष्य विकास हिंसा मुक्त समाज के रूप में देख रहे हैं। हम मानते हैं कि गुजरात में दंगे हुए थे और उस बारें में पता नही कोन कोन सी कमैटिया बैठाकर देख ली सरकार ने लेकिन परिणाम जस के तस। देश का दुर्भाग्य है कि यहां राजनीति जो होती है वो किसी मुद्दे को लेकर नही होती यहां पर होती है जाति के नाम पर धर्म के नाम पर सम्प्रदाय के नाम पर भाषा के नाम पर। यहां के नेताओं को विकास से कोई लेना देना नही है, कोई मरता मरो उन्हे चाहिए जो करोंङों खर्च करके जीते हैं उनसे 10 गुणा कैसे बने। मैंने तो आज तक मोदी जी का नाम किसी घोटाले में नही सुना। हां एक दिन जब उनका सद्भावना उपवास था तो मैं शुरू से ही देख रहा था मैं ही क्या सारा देश देख रहा था। वो उपवास पर बैठने से पहले अपनी मां का आशिर्वाद लेने के लिए उनके निवास स्थान पर गये तो उस भोली और भारतीय मां ने इस सपुत को एक रामायण और 101 रूपया दिया था। और शायद उस दिन जी जन्मदिन था। क्या देश को ये दृष्य याद नही अगर यही जन्मदिन मायावती का या सोनिया जी होता तो आपको पता ही क्या भेंट दी जाती।
हां यह भी सत्य है कि मोदी जी सख्त शाशक है और यह होना भी बहुत आवस्यक है जो शाशक सख्त नही होगा मुलायम होगा वहां पर व्यवस्था बिगङती ही रहेगी देख लो देश का हाल। और भगवान ने गीता में भी कहा है हे अर्जुन शाशन करने वालों में यमराज हुं में……. तो यह भी कोई गलत नही है। यह काल अंधकार का काल है लुट खसोट का समय है सब सोचते हैं कि किसी भी तरह से धनादि का संग्रह कर लो पता नही कल क्या हो हम सरकार में दोबारा आये या ना आये। मोदी जी के गले में हमने तो आज तक नोटो की माला नही देखी। और जैसा मैंने सुना है कि उनके खाते में एक या दो लाख से ज्यादा रूपये भी नही होंगे। तो ऐसे आदमी पर क्या हम उंगली उठा सकते हैं। जब भ्रष्ट लोगों को उनके खिलाफ कुछ नही हाथ लगता तो 2002 के दंगो की चिंगारी से उनका बेदाग सफेद कुर्ते को जलाने की सोचते हैं लेकिन उन मुर्खों को नही पता कि उस सफेद कुर्तें वो शील वस्त्र है जो प्रहलाद को होली की आग के अंदर से भी सुरक्षित निकाल लाया था।
दंगे में काफी लोग मारे गये थे लेकिन जो लोग अयोध्या से आ रहे थे उनको कोई नही याद करता जिन बेचारों को रेल के अंदर जिंदा जला दिया गया था, हां उनको याद करके अपना वोटबैंक भरने की योजना बनाते रहते हैं जो असली दंगे में मारे गये थे कोई भी दंगा एक तरफ से नही होता। वो तो मोदी जी की समझदारी देखो की किस तरह से हालातों को सुधारा और उसके बाद में आज तक कोई कर्फ्यु नही लगा वरना वहां के हालात ऐसे थे कि आये दिन बंद करना पङता था।
जो लोग दंगे में मारे हुए लोगो की दुहाई देकर कहते हैं मोदी दोषी है उनको किसी से कोई लेना देना नही है बस वोटों की आग है।
हिंसा तो हिंसा है उसमें कोई यह नही देखता कि मरने वाला कोन है।
और एक सबसे बङी बात देखो राजनीति की एक बदमाश जिसकें आतंकियों से नाता था दर्जन भर से भी ज्यादा केस चल रहे थे सोहराबुदीन उसका एनकाउंटर हुआ उस केस में 3 आई पी एस अधिकारी और एक मंत्री को जेल जाना पङा। मैं तो आपसे ही पुछता हुं कि अपराध हिंसा अन्याय अत्याचार खत्म करना गलत है क्या ……… अगर गलत है तो मोदी भी गलत है
शनिवार, 28 अप्रैल 2012
बुधवार, 18 अप्रैल 2012
नारी नही अर्द्धनारिश्वर कहो..................
नारी को प्रभु ने अपने शरीर के आधे भाग से बनाया है ऐसा हम सुनते आये हैं। चाहे कोई भी सम्प्रदाय हो उसमें ऐसा ही कुछ है कि जब सृष्टि बनी तो धरती पर आदम पहला मनुष्य को प्रभु ने भेजा जब वह हजारों साल अकेला घुमता रहा और भगवान ने सोचा कि यह तो इस तरह से पागल हो जायेगा तो उसी की एस पसली से एक महिला का निर्माण किया जिसका नाम ईव(हवा) रखा। इसका अर्थ यह हुआ कि नारी के बिना तो संसार ही अधुरा है। और कहीं भी देख लो शंकर पार्वती जी के साथ कृष्ण राधा के साथ विष्णु जी लक्ष्मी जी के साथ जीसस मदर मरियम की गोद में दिखाये जाते हैं।
यह बात हम सब लोग जानते ही नही मानते भी है कि बिना महिला के संसार का निर्माण होने वाला नही है। क्योंकि हम सब भी एक समाजिक प्राणी है। और हमें महत्व भी मालुम है कि बिना महिला के जीवन ही नही चल सकता। हमारे यहां एक कहावत है कि जिस घर में लङकी नही वो घर नरक के समान हैं। लेकिन यह हम लोग सुनते और कहते हैं असलियत तो बहत दुर है आज इतने आधुनिक युग में जहां कल्पना चावला अंतरिक्ष में पहुंच गयी वहां पर अभी भी लङकियों को भार समझा जाता है। और जिस घर में पहली बेटी हो गयी बङा अपसगुन मानते हैं। मैं किसी की क्या बात करूं अपने ही घर की बात करता हुं मेरी इकलोती बेटी डेढ साल से ज्यादा की है हमारे घर में 20 साल बाद बच्ची का जन्म हुआ तो सभी को बहुत बुरा लगा। लेकिन किसी को क्या पता था यह किसी पर भार नही है और दोस्तो लङकी किसी पर कभी भार नही बनती जैसे दुध का गिलास ऊपर किनारों तक भरा हो जिसमें एक बुंद दुध भी आने की गुंजाईस नही है वहीं पर एक गुलाब की पंखुङी भरे गिलास में डाल दो तो दुध भी बहार नही आयेगा और खुशबु भर देगी लङकी तो गुलाब की पंखुङी की तरह है सारे घर को खुशबु से भर देती है। वो ही मेरी बेटी जिससे देखकर घर में कोई खुश नही हुआ था आज वो सारे मुहल्ले की प्यारी है और घर में वो सब चीजें आ गयी जो हमारे पास थी ही नही।
अब जो बात में बताने जा रहा हुं उसे ध्यान से सुनना हो सकता है कि किसी के काम आ जाये मेरा एक दोस्त था जो अस्पताल में दवाई की दुकान पर काम करता था उसने मुझे सारी कहानी सुनाई में उसी के अनुसार लिख रहा हुं।
एक दिन उसके पास मालिक का ड्राईवर आया और कहने लगा कि भाई मेरी बीबी के गर्भ की सफाई करनी है तो उसने अपने सिनियर से पुछकर दवाई दे दी लेकिन वह महिला 3 माह से ज्यादा की गर्भवति थी उसकी ब्लीडींग तो शुरू हो गयी लेकिन सफाई नही हुई और उसे बङी परेशानी होने लगी तो उसे लेकर वो लोग पास के अस्पताल में गये वहां पर उसकी सफाई हो गई।
इस घटना को कोई एक महिना भर ही गुजरा होगा तो जिसने दवाई दी थी उसके पैर में अचानक 1 इंछ गहरा कांच धंस गया और जो सिनियर था वो मरने से बचा पिलिया में उसकी इतनी हालत खराब हो गयी और अंत में जिसकी बीबी थी वो गाङी लेकर नोयडा जा रहा था कि ऐसा एक्सीडैंट हुआ की करीब 18 महिनों तक बैड पर ही पङा रहा और बाद में भी काम करने के लायक नही रहा। जब यह घचना उसने मुझे बताई तो मेरे मुंह से एकाएक निकला यह उस बच्ची की चिख का फल है। ऐसा नही है कि हमारे कर्मों का फल हमें नही मिलता मिलता तो हैं लेकिन हम उसे समझ नही पाते और उसका कोई दुसरा कारण मान लेते हैं।
दोस्तों लङकी ही है जो घर में बाप भाई या कोई भी कुछ काम कहता है तो रोटी को छोङकर पहले काम करती है लङका कभी नही उठता देखा होगा।
और यह सारा समाज ही आज उसी बच्ची पर अत्याचार कर रहा है जब गर्भ में आयी और मां बाप को पता लग गया तो उसका पेट में ही गला घोंटने की सोचते हैं और अगर किसी तरह से जालिम की नजरों से बचकर पैदा हो गयी घर में सभी उसका पैदा होते ही बहिष्कार करने लगते हैं दादी तो कहती है कि पता नही कैसी बहु है पहले ही बेटी जन दी जबकि दादी भी भुल गयी की तु भी किसी दिन एक बच्ची के रूप में जन्मी थी। चलो कोई बात नही पैदा भी हो गयी थोङी बङी क्या हुई की हवश के भेङियों की नजरों से नही बच पाती किसी तरह से अपने को बचाती हुई बङी भी हो गयी शादी भी हो गयी तो सबसे बङा कष्ट लोग आजकल लङकियों को तो वस्तु ही समझने लगे हैं जैसे कुर्सी मेज फ्रिज टीवी बस दहेज के दानवों का अत्याचार शुरू हो जाता और हद तो तब होती है जब उस कोमल सी बच्ची को शराब के नशे और दहेज के लालच में पंखे पर लटका दिया जाता है या आग के हवाले कर दिया जाता है या फिर रोज रोज की यातनाएं झेलती रही और मरती रहे अब फैसला आपके हाथों में है कि हमें क्या करना है बस लिखने से कोई काम होने वाला नही है जब तक हम सब कोई ठोस कदम नही उठायेगें आज कलम उठाने के साथ साथ आवाज उठाना भी बहुत जरूरी है।
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