बुधवार, 16 दिसंबर 2009

प्रेम बङा दुर्लभ है----



दिखता तो ऐसा नही है हमें तो हर तरफ प्रेम ही प्रेम ही दिखता हम तो दिन में कई बार सुनते होंगे की जैसे कोई कहता है कि मैं तो फलां आदमी से बङा प्रेम करता हुं। और वह भी मुझसे बहुत प्रेम करता है। जब चारो तरफ प्रेम ही प्रेम है तो आप सोच रहे होंगे की शिवा पागल हो गया है क्या जो कह रहा है कि प्रेम बङा दुर्लभ है। ऐसा हो सकता है कि शिवा के जीवन में ही प्रेम ना हो सिर्फ और सिर्फ जीवन नीरस हो।
चाहे कोई जैसा भी समझे लेकिन मैं जीवन के तथ्यों को गहराई से जांचकर परखकर उनका विशलेषण करके ही कुछ लिखने का साहस करता हुं।
सच्चाई बङी कङुवी होती है कई बार सच को निंगल पाना नामुनकिन हो जाता है। और हम ऐसी असमंजस की हालात में फंस जाते हैं की अगर स्वीकार करें तो मरे ना करें तो मरे। हमारे यहां एक कहावत है पागल गिदङ के किसी ने कान पकङ लिए अब छोङे तो खाने का डर और नही तो कब तक पकङे रखेगा। तो यह सच्चाई है कि प्रेम बङा दुर्लभ है अर्थात प्रेम होना बङा कठिन है।
यहां संसार में तो कोई मानने को ही तैयार नही होता क्योंकि आप हो या मैं हममे से कोई भी नही चाहता की हमारी किसी भी बात की पोल सबके सामने खुल जाये सबके सामने उजागर हो जाये।
भगवान श्री कृष्ण ने गीता में एक जगह कहा है कि हजारों में कोई एक मुझे खोजने के लिए चलता है यानि की हजारों में से किसी एक के अंदर प्रेम का बीज अंकुरित हुआ। और उनमें से भी कोई एक है बिरला जो मुझे तत्व से जानता है। कितना स्पस्ट कहा है लेकिन हमारी तो समझ में ही नही आता। अरे बाबा जब किसी के अंदर प्रेंम उपजेगा तो ही तो प्रमात्मा की तरफ चलेगा अर्थात मानवता, अहिंसा, सदभावना, सहयोग, मैत्री और करूणा ह्रदय में प्रवेश करेगी।
सर्वप्रथम यह समझना चाहिए की प्रेम है क्या कैसे होता। कई बार हम किसी और चीज को ही प्रेम समझते रहते हैं। और भागते रहते हैं जीवन भर उसी के पीछे पागलों की तरह, और पता भी नही रहता की क्या कर रहे हैं और जाना कहां है। और अंदर ही अंदर खुश होते रहते हैं कि प्रेम प्रमात्मा का गुण है जो हमारे भीतर सबसे ज्यादा है।
एक छोटा सा उदाहरण है एक कोई गरीब आदमी था बेचारा उसने जीवन में कभी खीर नही देखी थी। उसका एक साथी खीर की बङी तारिफ कर रहा था। आज तो भाई मजा आ गया किसी ने मुझे खीर खिलाई। उस बेचारें ने बङी सहजता और भोलेपन से पुछा कि भाई कैसी होती है खीर.............
दोस्त ने कहा मीठी स्वाद्धिष्ट बङी लजीज होती है।
उसको क्या पता बेचारे को पुछता है की भाई देखने में कैसी होती।
अब वो कैसी बताये सामने एक बगुला खङा था कहने लगा देख इस बगुले जैसी सफेद होती है।
तो आप और हम सब समझ गये कि क्या हर सफेद चीज खीर हो सकती है। वैसी ही उपमा प्रेम की हो रही है। हम चाहे किसी से भी बात करके देखे बस यही कहेगा की मुझसे ज्यादा प्रेम तो कोई करता ही नही। कि इतना प्रेम करता हुं की फलां आदमी के बिना जी नही सकता। अरे भोले भाई प्रेम तो जीना सिखाता है जीवन को कैसे जीये ये हमें सिखाता है। जहां यह बात है कि हम जी नही सकते, तो प्रेम के बजाय कुछ ओर ही है जिसका हमने दर्शन किया है। राधा ने तो कभी नही कहा था की मैं कृष्ण के बिना नही जी पाऊंगी। और मीरा तो कृष्ण के प्रेम के आन्नद में झुम उठी थी, और कोई भी व्यक्ति दुखों में तो झुमेगा नही। भगवान श्री कृष्ण प्रेम के महासागर हैं। इसलिए बार बार कहते हैं कि हे अर्जुन तु मेरा सखा है भक्त है इसलिए जो गोपनीय से भी गोपनीय ज्ञान है वह मैं तुझे दे रहा हुं। अर्थात वह रहष्य तुझे बता रहा हुं। और हमारा कैसा प्रेम है। कि मैं फलां से प्रेम करता हुं वह भी मेरी सारी बात मानता है लेकिन जिस दिन उसी आदमी ने हमारी कोई बात मानने इंकार कर दिया तो सारा प्रेम टुटकर बिखर जाता है अब उससे खराब कोई नही है वह ही हमारा सबसे बङा दुष्मन बन जाता है। अरे भाई प्रेम तो दिव्य है अलौकिक है असीम है किसी का बंधन नही होता इसके ऊपर। और अगर किसी के अंदर एक बार अंकुरित हो जाये तो फिर जो भी उसके निकट आयेगा सभी को प्रेम मिलेगा ऐसा नही है जैसे एक मां अपने बच्चे को तो सीने से गलाकर रखती है और दुसरे का बच्चा चाहे रास्ते पर पङा रोता रहे कोई दया नही आती कोई प्रेम नही उमङता इतना स्वार्थी नही होता प्रेम इतना संकुचित नही होता।
जैसा आजकल देखा जा रहा है हम सबके समक्ष है एक लङका और एक लङकी आपस में बहुत प्यार करते हैं और एक दुसरे के लिए सभी दीवारें सभी मर्यादाएँ तोङकर मां बाप के प्रेम को ठोकर मारकर एक बंधन में बंध जाते हैं। कितना अटुट प्रेम है जिसने मां की ममता को भी दरकिनार कर दिया और पिता की परवरिश को भी अनदेखा कर दिया। एक दुसरे की हर बात को हर क्षण मानने को तैयार रहते हैं। एक दुसरे की दिल की धङकन हैं। कुछ समय बाद उन्ही के घर के प्रेम के मंदिर में हिंसा के कुत्ते भौंकते हैं नफरत और घृणा हर पल नाचती है। तो कहां छु मंत्र हो जाता है वह प्रेम। समझना बहुत कठिन है कोई सच्चाई को स्वीकार नही करना चाहता। सब भ्रम में जी रहे हैं। लोगो ने अपनी इच्छाओं को आसक्ति को प्रेम का चोला पहनाकर सबको को धोखे में रखते ही हैं स्वंय को भी धोखा दे रहे हैं।
जय श्री कृष्ण
शिवा तोमर-- 9210650915

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

जीवन का आईना- श्रीमद भगवद्गीता-प्रथम



प्रथम अध्याय---
दुख और मोह से पीङीत है दुनिया
गीता का प्रारम्भ होता है युद्ध के मैदान कूरूक्षेत्र से, जहां कोरव और पांडव अपनी अपनी सेना के पुरी तैयारी में हैं। इसमें ऐसा दिखाया गया आदमी पहले भी कितना चतुर और चालाक था। यहां आपको कुटनीति, राजनीति, रणनिती सभी का दर्शन होगा बस ध्यान से एक एक बात को गहराई से चिंतन करते चले कुछ छुट ना जाये। कहीं ऐसा ना हो की जो काम का हो वो ही हमारे हाथों से निकल जाये और बाकि सब कुछ पकङे रहे। इस बात के प्रति सावधान रहे। और ये बात तो स्वंय भगवान ने भी कही है की यदि में कर्मों में सावधानी ना बरतु तो बङी हानि हो जाये। अगर हम भी सावधान नही रहेंगे तो कोई हानि तो होगी ही। इसलिए सचेत रहे सजग रहे। गीता शास्त्र ऐसा सागर है जिसमें से हर व्यक्ति को अपने अनुसार वो सबकुछ मिल सकता है जिसकी उसे जरूरत है। और यह भी देखना है कि आज ही नही पहले से ही यह मानव किस तरह अपना काम निकलवाने के लिए कैसे कैसे हथकंडे अपनाता था। लालच और स्वार्थ ऐसा है कि राजा धृतराष्ट्र को यह देखने की इच्छा हो रही है कि युद्ध के मैदान क्या हो रहा है। इतनी उत्सुक्ता हो रही है लङाई देखने की और यह भी पता है कि यह कोई आम युद्ध नही है इसमें लाखों लोग मारे जाने वाले हैं। रक्त की नदियां बहने वाली हैं। और जो भी होगा उसमें उन्ही के बच्चे मारे जायेंगे क्योंकि पाडव और कौरव दोनो ही अपने हैं। प्रथम अध्याय में ही हमारे सामने दोनो बात आ जाती हैं कि एक तरफ युद्ध को देखने के लिए और करने के लिए लालायित हैं तो दुसरी तरफ अर्जुन इतने बङे नरसंहार के परिणाम की कल्पना करके कहते हैं कि हे भगवान में अपने गुरूजनों ताऊ चाचा दादा प्रदादाओं को मारकर भीख लेकर खाना भी कल्याण ही समझता हुं। क्योंकि उनके रूधिर से सने हुए भोगों को नही भोग सकते हैं हम लोग। युद्ध की तैयारी होते हुए ही दुर्योध्न गूरू द्रोण के पास जाता है। यहां यह बात स्पस्ट होती है की कितना चालाक था दुर्योध्न की सेना का सेना पति भीष्म है। और वह सबसे पहले द्रोण के पास गया। और जाकर अपने सेनापतियों की गिनती कराता है और सबसे पहले द्रोण के सामने उनका ही नाम लेता है जिससे की वह खुश हो जाये। वह जानता था कि ये सब लोग लङ तो तेरी तरफ से रहे हैं लेकिन भावना पांडवो की तरफ है। उनका अहित नही करना चाहेंगे। तो वह अपनी साम,दाम,दंडभेद वाली सारी प्रकिया अपनाता है। हर व्यक्ति के जीवन में शंखनाद होता है। महाभारत में भी शंखनाद हुआ। बताया जाता है कि युद्ध का शंखनाद किया भीष्म ने। हर बात के दो पक्ष होते हैं एक अच्छाई दुसरा बुराई, एक धर्म दुसरा अधर्म। लङाई और हिंसा धर्म नही करना चाहता जब भी लङाई हिंसा तकरार कुछ भी कहो वो अधर्म ही करता है। उस समय भीष्म अधर्म के साथ हैं तो शंखनाद भी उन्ही की तरफ से हुआ। उसके पश्चात स्वेत घोङो के रथ पर बैठे श्री कृष्ण महाराज ने पाचजन्य शंख बजाया। स्वेत घोङो पर सवार अर्थात शांत है जब अधर्म बढ रहा है तो धर्म के रक्षा के लिए पंचजन्य बजाकर युद्ध का शंखनाद किया। गीता तो हर कोई पढ सकता है मैं तो सुक्ष्म बातें आपके समक्ष रखने चाहता हुं। अधर्म के साथ कोई भी चलना नही चाहता हर कोई बचता है। संजय बताता है कि महाराज वह शंखनाद ऐसा हुआ कि आपके पक्ष वाले योद्धाओं के ह्रदय विदीर्ण कर दिये भयभीत कर दिये। यह बात समझने की अब तो संजय भी कौरव पक्ष को अपना नही मान रहा। अगर कोई नोकर मालिक के पास बैठा होता है तो वह यही कहता कि हमारा पक्ष। लेकिन संजय को भी ज्ञात था कि ये सब गलती पर है पाप के साथ हैं अधर्म के साथ है और कोई नही चाहता की मैं पाप का साथ दुं वही किया संजय ने।
इसके पश्चात कितना गहरा रहष्य है कपिध्वज से संबोधित किया है यहां अर्जुन को। अर्जुन कहता है की हे कृष्ण में इस सेना को देखना चाहता हुं। कपिध्वज यानि की जिसकी झंडे पर पताका पर हनुमान जी है यह प्रतिक है। हम सब भी किसी ना किसी प्रतिक के साहरे चलते हैं। गीता में यह दर्शाने की क्या जरूरत थी लेकिन उन्होंने समझी थी क्योंकि जिस प्रतिक के साहरे हम चल रहे हैं उसके गुण भी तो हमारे अंदर होने चाहिए ना। हनुमान जी जिन्होंने अधर्म के विरूद्ध पाप के खिलाफ 100 योजन का समुंद्र लांघ कर रावण की गुफा जहां पर यमराज भी आने से कतराते थे वहीं पहुंच गये थे। और अर्जुन ध्वजा पर हनुमान जी का प्रतिक लगाया है लेकिन अब असमंजस में पङ गया और ऐसी घङी में जब युद्ध का शंखनाद हो गया तब देखने की इच्छा कर रहा है। सब बातें भुल गया की ये वही लेग हैं जिन्होंने द्रोपदी को भरी सभा में नग्न करने का प्रयत्न किया था और धोखे से लाक्षाग्रह में जलाकर मारने की कोशिश की। और भगवान भी कम नही थे उसके रथ को ले जाकर भीष्म और गुरू द्रोण के सामने खङा कर दिया और उनकी तरफ उंगली करके कहते है कि देख ये सब हैं जिनसे तुम्हें युद्ध करना है। अगर भगवान युद्ध कराने की सोचते तो रथ को दुर्योध्न कर्ण और दुशासन के सामने खङा करते और जिसे देखते ही अर्जुन का खुन खोल उठता। चाहे कितना भी कायर हो डरपोक हो लेकिन दुष्मन को सामने देखते ही मारने की सोचता है। लेकिन भगवान ने रथ खङा किया भीष्म के सामने जिसके हाथों से अर्जुन ने खाना सिखा, कपङे पहनने सिखे। गुरू द्रोण जिसने धनुष पकङना सिखाया तरकस टांगना सिखाया और आज उन्हीं के सामने धनुष लेकर खङा होना पङ रहा है।
उन सब को देखकर कहते हैं कि अर्जुन को मोह सा हो गया लेकिन स्वंय अर्जुन ने कहा है कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता। अर्थात कायरता रूप दोष से उपहत स्वभाव वाला में धर्म के विषय में मोहीत हुआ आपसे पुछता हुं। और यहां पर जब उसने सारी सेना देखी की सब अपने ही हैं और इतने शक्तिशाली की सभी के पराक्रम से परिचित भी था। तो उसे कुछ मोह भी हो गया और भय भी हो गया। यहां पर कई लोग कहते हैं कि वह मनोरोगी हो गया था। यह भी संभव है क्योंकि मनोरोगी वही होता है जिसका कहीं ना कहीं शोषण हुआ हो या कुछ छिन गया है। और ये दोनो बात ही अर्जुन के साथ घटित हुई इसलिए मनोरोगी हो गया। और कि इन सब लोगो को मारकर राज्य भोगने से बेहतर तो ये ही होगा की धृतराष्ट्र के पुत्र मुझ शस्त्र रहित को मार डालें वह भी कल्याण कारक होगा। कितना भयभीत हो गया की हाथ से हथियार छुट रहा है शरीर काप रहा है मुख सुख रहा है त्वचा जल रही है। ये सब भय के ही लक्षण है मोह के नही। और इसी भय को छिपाने के लिए कितनी दुर तक की बातें बताने लग जाता है भगवान को ये मत समझना की ये सिर्फ अर्जुन के जीवन की घटना है हम सबके जीवन में भी यही सब हो रहा है। कहता है की अगर सब लोग मर जायेंगे तो कोन पुर्वजो के पिंड दान करेगा और सारी स्त्रीयां अत्यंत दुषित हो जायेंगी और वर्णशंकर पैदा होगा। वह इस भयानक युद्ध से बचना भी चाह रहा था लेकिन यह भी सोच रहा था कि कोई यह ना कहे की डरकर भाग गया है। और कहता है कि हम बुद्धिमान होकर भी इस महान पाप करने को तैयार हो गये और एक आह सी निकलती है उसके मुंह से जिसका स्पस्ट वर्णन किया है कि हा शोक.......। जैसे पता नही कितना बङा जुलम करने जा रहा हो। आज यह युद्ध अर्जुन को पाप लग रहा है ना जाने कितने युद्ध किये और कितने लोगो को मारा तब पाप नही था। सब राज्य और सुखों को छोङकर वन जंगल में रहना ही पसंद करता है। साफ कह देता है की मुझसे युद्ध नही होगा। अब जरा चिंतन करो की क्या हम अपने जीवन में आये दिन किसी ना किसी जिम्म्दारी से पलायन करने की नही सोचते और उसका ठिकरा किसी और के सिर फोङते हैं। ऐसा युद्ध हमारे अंदर चलता ही रहता है और हमारा मन है कि कोई ना कोई बहाना बनाकर युद्ध से बचता रहता है और बातें घङने की आदत सा बन गयी है लेकिन जैसे हमारे पास कोई ऐसा नही है इससे हमें निकाल सके क्योंकि जो निकाले वह पहले ही ऐसा होना चाहिए जो इस समस्या से मुक्त हो। वहां तो भगवान थे कोई आम आदमी नही स्वंय भी उलझा रहे। भगवान ने पहले अध्याय में कुछ नही बोला क्योंकि जो व्यक्ति अपनी गलती छुपाने की कोशिश करता है वह सामने वाले को बोलने का मौका कम ही देता है। और सोचता है कि बस मेरी सुने और मान जाये। यहां तक पहला अध्याय है कि धनुष बाण सब छोङकर रथ के पिछले भाग में बैठ गया। इतना तनाव में पहुंच गया कि कुछ समझ ही नही आ रहा कि क्या करूं और क्या ना करूं। यह देखो ना कि जब आदमी किसी काम से बचने के लिए आत्महत्या करने तक की बात करने लगे तो कैसी स्थिती होगी कल्पना मात्र से ही सारे बदन में सिहरन सी दोङती है। भगवान सारथी भी है और अर्जुन के सखा भी है। पहले अध्याय को विषाद योग कहा गया है यानि की दुख का मिलना । और जब हम अपनी जिम्मेदीरियों से पलायन करेंगे तो दुख और विषाद तो प्राप्त होगा ही। अर्जुन को इतना भारी तनाव गलत नही हुआ था क्योंकि एक सैनिक होने के बाद भी वह युद्ध से बचने के रास्ते खोज रहा है तो क्या होगा अगर कोई शिक्षक, डाक्टर, इंजिनयर कोई भी अपने काम से अपने फर्ज से पलायन करेगा तो उसका परिणाम भारी तनाव और विषाद का योग तो भोगना ही पङेगा । शिवा तोमर-9210650915

जीवन का आईना- श्रीमद भगवद्गीता



विस्व का सबसे पवित्र और प्राचीन ग्रंथ है श्री मद्भगवद्गीता। नाम तो इस शास्त्र का संसार के बहुत से लोगों ने सुना होगा लेकिन इसका अध्ययन किया होगा 4-5 प्रतिशत ने ही। और अगर दर्शन करने की बात की जाय तो हजारों में किसी एक ने इसका यथार्थ रूप से दर्शन किया होगा। लोग इसे पढना नही चाहते पलायन करते हैं इससे। और अपने को सही साबित करने के लिए कुछ प्रमाण भी बताते हैं। कोई कहता है कि ये तो हिंदूओं का शास्त्र तो कोई कहता है कि ये तो साधु संतो के लिए है, तो कोई युद्ध की जङ बताते है, कहते हैं कि अर्जुन तो युद्ध करना ही नही चाहता था कृष्ण ने यह उपदेश देकर कितना बङा नरसंहार कराया। मंदबुद्धि लोग ऐसे बाते करके ही इसके अध्ययन करने से बचने लगे।
यह भी सत्य है कि यह युद्ध क्षेत्र में दिया गया उपदेश है। लेकिन भगवान का मकसद युद्ध कराने का नही था, नही तो भीम और अर्जुन को कहीं भी भङका कर युद्ध करा सकते थे। लेकिन भगवान ने यह कहा है हे अर्जुन यह योग तो मैंने कल्प के आदि में सुर्य को दिया था ऐसा नही है कि तुझे ही दिया है। लेकिन अब यह लुप्तप्राय हो गया है इसलिए मैं तुझे यानि कि तेरे माध्यम से फिर दे रहा हुं। जिससे सभी का कल्याण हो सके। इसकी आवस्यकता तो सभी मनुष्यों को थी और रहेगी। और जब जब लोग इससे विमुख होगें तो ऐसे ही भृष्टाचार अपराध हिंसा और व्याभीचार में वृद्धि होगी ही। ये बात नही है कि अर्जुन को यह लङाई करने के लिए दिया था। यह उपदेश तोङने के लिए नही जोङने के लिए है। नफरत के लिए नही प्रेम और सदभावना के लिए है। श्री मद्भगवद्गीता का प्रारम्भ ही ऐसे बातों से होता है कि जिससे ज्ञात हो कि कितनी अज्ञता भरी पङी थी लोगो में। धृतराष्ट्र कहता है हे संजय कुरूक्षेत्र में मैंरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया है क्या कर रहे हैं वो। जहां श्री कृष्ण स्वंय मोजुद हो भीष्म, गुरू द्रोण, कृपाचार्य, और राजा स ऐसी बात करें तो कितना गलतो हो सकता है। तेरे मेरे की ओर पाडुं पुत्र तो उन्हें सर्वस्व ही समझते थे लेकिन मोह और लोभ में अंधा धृतराष्ट्र के मन में तेरे मेरे की दीवार बन गयी थी। तो ही ऐसी बात कर रहा था। तो देश समाज इमानदारी और इन्सानियत का क्या होगा हर तरफ मारा मारी हर तरफ खुन खराबा ही होगा। एक राजा के अंदर ऐसे भाव तो क्या होगा समाज का ऐसी स्थिती में गीता का उपदेश दिया गया था। जिससे ऐसे भाव समाप्त होकर सदभावना जागे।
मैंने लिखा है जीवन का श्री मद्भगवद्गीता। मैं कोई ज्ञानी नही हुं बस उस महायोगेश्वर भगवान श्री कृष्ण का आभारी हुं जिन्होंने ऐसा विवेक दिया और मैंने गीता अध्ययन किया और इसमें पाया की यह तो जीवन का आईना ही है। यह हमें ऐसा दिखाती है जैसे हम होते हैं। मैंने कभी भी गीता को इस तरह से नही पढा की जैसे ये अर्जुन को सुनाई थी मैंने तो सदा इसी भाव से पढा जैसे ये मेरे लिए ही हो और मुझे ही सुनाई हो। गीता पढने का अपना लाभ है मैं ये नही कह रहा की लाभ नही है। यह तो दिव्य है अलौकिक है निर्मल है । इसके स्पर्स मात्र से ही कल्याण हो जाये। लेकिन जो भगवान ने आदेश दिया है उस पर चले बिना कैसे मंजील तक पहुंचेगे। जैसे सङक पर चलने के लिए कई दिशा निर्देश लिखे होते हैं जैसे लाल बत्ती हो गयी, कहीं पर बोर्ड पर लिखा होगा की प्रवेश वर्जित है, तो कही लिखा होगा की गाङी खङी ना करे ये सभी निर्देश हमारी सुरक्षा के लिए जिससे हम अपनी मंजील तर जल्दी और बिना किसी कष्ट के पहुंच सके इसिलिए बनाये हैं।
गीता को कहानी की तरह से नही पढना है बल्कि उसमें दी गयी शर्तों के अनुसार ही पढना है तभी हम अपनी मंजील कर पहुंचेंगे। भगवान ने कदम कदम पर संकेत दिया है ये नही करने या ऐसा करोगे तो लाभ होगा लेकिन हम वो संकेत तो देखते ही नही और अपनी गाङी को 100 की रफ्तार से भगाते रहते हैं और टक्कर मारते रहते हैं और कोसते रहते हैं कि हम तो भगवान का नाम लेते हैं उनका ध्यान करते हैं गीता भी पढते हैं लेकिन विपत्तियां तो हमारे ऊपर आती ही रहती हैं। अरे भाई जब हम संकेतो को देखकर चलेंगे ही नही तो परेशानी तो आयेगी ही। मेरा यह लिखने का उद्देश्य यह नही है कि किसी को ज्ञान दुं ज्ञान तो सभी के पास है। हो सके किसी की नजर में कोई संकेत आ जाये और हमारी जीवन की गाङी सही सलामत पहुंच जाये अपनी मंजील तक। यह मैं लिखने की कोशिश कर रह हुं अगर कोई त्रुटी हो या सुझाव हो तो जरूर बतायें।

गुरुवार, 19 नवंबर 2009

हर कोई है असंतुष्ट


क्या अजीब बात है क्यों नही है संतुष्टि,,,,,, यह मैं खाली बात ही नही कर रहा। बहुत अध्ययन किया चिंतन किया मनन किया। तब लिखने का साहस किया है।
और यह किसी एक व्यक्ति की बात नही है बल्कि सारी दुनिया मे मच रही हा हा कार आपाधापी भृष्टाचार और अपराध का आंकङा देखकर सभी बातों पर गहरा विचार किया और खोजने का प्रयत्न किया कि व्यक्ति देश और संसार में इतनी त्राही त्राही क्यों हो रही है।
भगवद्गीता में एक श्लोक है..... किसी विषय का बार बार चिंतन करने से उसकी आसक्ति होती है और आसक्ति से कामना पैदा होती है कामना अर्थात पाने की लालसा। और जब कामना पुर्ण नही होती तो असंतुष्टि होती है। और व्यक्ति कुछ भी कर बैठता है। चाहे वह कितना भी जघन्य अपराध ही क्यों ना हो।
अगर स्वभावत: यह बात किसी से पुछी जाय तो शरमा शरमी हर व्यक्ति कहता है कि मैं तो बिलकुल संतुष्ट हुं।
लेकिन अगर हम अपने ही अंदर खोजे तो सब असंतुष्ट हैं। कोई करोङो में एक आद होगा जो संतुष्ट होगा। जब बच्चा गर्भ से बहार आता है इतना दुख और कष्ट से गुजर कर बहार आता है होना तो उसे खुश चाहिए लेकिन फिर भी रोता है। और रोता कोन है जो किसी चीज की कामना कर रहा हो। किसी चीज की उसके पास कमी हो अर्थात कहीं ना कहीं असंतुष्ट है।
और भगवान ने गीता में हम सबको कहा भी है कि मुझे वह भक्त प्रिय है जो सदा ही संतुष्ट है। वरना भगवान को क्या पङी थी यह बात कहने की अगर किसी को कोई बीमारी हो जाती है हम अच्छे से अच्छे डाक्टर के पास जाते हैं और बीमारी का इलाज करवाते हैं। लेकिन अपनी इस घातक बीमारी को अंदर ही अंदर पनपने देते हैं, बतायें तो क्या कोई स्वीकार तक नही करना चाहता कि मैं संतुष्ट नही हुं। बल्कि इसको ढांपने के लिए तरह तरह की बातें बताकर यह समझाने का प्रयत्न करते हैं कि जिस बीमारी से सब जुझ रहे है मैं उससे मुक्त हुं।
एक छोटी सी कहानी है। एक साधु बाबा कही भ्रमण पर जा रहे थे जाते जाते रात हो गयी आगे बियाबान जंगल और पुराने जमाने में तो शेर चीते आदि खतरनाक जानवर ऐसे ही खुले घुमते रहते थे। रास्ते में एक बुढिया की छोपङी दिखाई दी और रात काटने के लिए वहां पहुंच गये बाबा। उसने साधु बाबा की अपने सामर्थ्य के अनुसार बङी खातिर दारी और सेवा की।
जब रात को खाना खाकर विश्राम करने लगे तो बाबा बोले की तुमने मेरी बहुत सेवा की है और तेरे पास कोई कमाने वाला भी नही है। जो मुझे आटा वगैरह भीक्षा में मिला है उसमें से आप भी कुछ ले लो। बुढी माई ने अपने आटे का बरतन देखा और कहने लगी की महाराज सुबह का काम चल जायेगा और सांय को ऊपर वाला देगा। देखा कितनी संतुष्टि।
बाबा को यह बात सुनकर बङा आश्चर्य हुआ कि हम तो बाबा होकर भी संग्रह करते रहते हैं और और इसके पास कुछ है ही नही फिर भी कितने मजे में है। ना कोई चिंता है ना कोई फिक्र।
यह है सच्ची संतुष्टि। अगर कोई चीज हमारे पास नही है या इसका अभाव है और हम कहे कि मुझे उसकी कोई इच्छा नही है इसे संतुष्टि नही कह सकते।
जैसे कोई शाराब का सेवन करने वाला जेल चला जाता है (ये बात मैं सिर्फ सुनकर नही कह रहा है गहरा चिंतन किया है) और वहां तो शाराब या कोई भी नशा का सामान मिलता ही नही और वो महिना दो महिना शाराब या कोई भी ड्रग्स छोङ दे और कहे मुझे इच्छा नही है मैं संतुष्ट हुं तो कोरी बात है कोई भी विस्वास नही करेगा।
यहां किसी एक की बात नही हो रही है मानव स्वभाव की बात हो रही है मानव मन की बात हो रही है।
यहां एक बात को और साफ करना चाहता हुं कि असंतुष्टि सिर्फ धन दौलत और पैसे की हा नही होती। आदमी असंतुष्ट लोभ, भय, क्रोध, वासना किसी से भी हो सकता है। जरा देख लो इस लोभ के कारण ही उचित या अनुचित तरिके धनादि का संग्रह करते हैं। और मान लो किसी को आप या कोई भी समझाये तो कहेंगे कि अगर हम लोभ की इच्छा नही करेंगे तो अपने क्षेत्र में चाहे वह व्यापार हो या नोकरी या शिक्षा कैसे आगे बढेंगे कैसे तरक्की करेंगे।
लेकिन समाज सुधारकों ने बुद्धिजीवियों ने इसका खंडन किया है लोभ से तो हम अपने अंदर बैचेनी, व्याकुलता और स्वार्थ को बढा रहे हैं। जो भी हमारी कामनाए हैं उसमें लोभ की कामना ना करें उसके प्रति बस प्रयास करें की लाभ कैसे हो और वो भी किसी कि सुख शांति भंग ना करके।
दुसरा सबसे बङा कारण असंतुष्टि का,,,,, हमारे अंदर की वासना है।
एक ऐसा भाव जो सभी के अंदर है जिससे कोई भी बचा हुआ नही है। चाहे लाख छिपाने की कोशिश करे लेकिन छिपा नही पाते। कोई कहां तक बताये कि कितनी असंतुष्टि है। हां ये हो सकता है कि कोई थोङा ज्यादा तो कोई थोङा कम असंतुष्ट हो।
अर्जुन भगवान से पुछते हैं हे प्रभु यह मनुष्य किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है। भगवान कहते हैं कि यह काम ही पाप है, हिंसा है, अपराध है काम यानि कि कामनाएं।
और यह बहुत खाने वाला भोगों से कभी ना अघाने वाला है। संसार में अपराध, हिंसा, नशा और सैक्स में वृद्धि का कारण ये असंतुष्टि ही है।
एक और छोटी सी कहानी है एक आदमी बेचारा नोकरी करके अपना और परिवार का पेट पाल रहा था। एक दिन उसकी बीबी ने कहा कि घर में एक टीवी आ जाये तो कितना अच्छा होगा। उस भले आदमी के अंदर अब इसका ही चिंतन चलता रहता कि भगवान बस टीवी आ जाये। और कामना पुर्ण हुई भी टीवी आ गया।
अब वह अपने एक दोस्त से बोला की भाई बस एक स्कुटर और मिल जाये तो बसों के धक्के खाने से छुटकारा मिल जायेगा। उसकी यह भी इच्छा पुर्ण हुई और एक स्कुटर भी आ गया। एक कामना पुर्ण नही होती की दुसरी सिर उठाकर खङी रहती। एक के बाद एक बस हर पल बैचेन रहने लगा उसके जीवन की सुख शांति छु मंत्र हो गयी। सारा दिन इधर उधर भागता रहता मकान बन गया एक कार खरीद ली एक फैक्टरी भी लगा ली। घर में सब ऐसो आराम का सामान आ गया। बस अपने दोस्त से एक दिन बोला की भाई बस भगवान एक फैक्टरी और लगवा दे तो बेटे को देकर बस हम दोनो पति पत्नि आराम से अपनी फैक्टरी में गुजारा कर लेंगे। अरे बाबा कहां संतुष्ट होगा यह मानव चाहे कितना भा मिल जाये फिर भी पागलों की तरह भागता रहेगा। कभी भी तृप्ति नही होती। कोई ना कोई उत्कंठा बनी ही रहती है। और उस भले आदमी को बस इसी तनाव में कि ये मिल जाये आज ये मिल जाये एक दिन दिल को दौरा पङा और भगवान को प्यारा हो गया।
कोई भी व्यक्ति जो उसके पास है उससे संतुष्ट नही है बस कहीं से ना कहीं से और ज्यादा प्रप्त हो जाये इसी उधेङ बुन में ही लगा रहता है। और अपनी संतुष्टि के लिए उचित या अनुचित कोई भी कार्य करके जिस वस्तु व्यक्ति या किसी और पदार्थ की कामना करता है हासील करने का भरकस प्रयास करता है। साम दाम दंड भेद वाली सारी नीति अपना लेता है।
इसी बात का खंडन भगवान ने गीता में ही किया है कि जिस तरह एक आम आदमी अपने जीवन यापन के लिए संग्रह करता रहता है विवेकी पूरूष भी उसी तरह लोक संग्रह चाहता हुआ कर्म करे। इस तरिके से ही हम संतुष्ट हो सकते हैं। लेकिन लोक संग्रह या परमार्थ तो कही रहा ही नही बस स्वार्थ ही स्वार्थ चारो तरफ मुंह बाये खङा रहता है। और हम अपनी असंतुष्टि पुर्ती के लिए अपनी तामसी बुद्धि के कारण अधर्म को भी धर्म मानकर जो भी हमें चाहिए उसे प्राप्त करने के लिए तत्पर रहते हैं।
इसे पढकर आप कृपा अपने विचार जरूर बताये।
जय श्री कृष्ण
शिवा तोमर-09210650915